रमजान को इस्लाम में बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है और ऐसा कहा जाता है कि यह महीना अल्लाह की रहमत, बरकत और मगफिरत (माफी मांगने का) का महीना होता है। इस्लाम धर्म के मुताबिक रमजान के महीने में रोजा रखने से इंसान की आत्मा पवित्र होती है। रूहानी और जिस्मानी (आघ्यात्मिक और शारीरिक) रूप से शुद्ध होते है। रोजा रखने से अनुशासन, सब्र, संयम, प्रेम, आदि सीखने को मिलता है। रमजान में रोजे रखने से हम अपने आप को कैंसर जैसी भयानक बीमारी से बचा सकते हैं।
कार्यपालक पीएचडी के कार्यपालक अभियंता मो रेयाज आलम ने कहा है कि रमजान में जब हम रोज़ा रखते हैं, तो हमारे शरीर के न्यूट्रिएंट्स खत्म होने लगते हैं, तब हमारे जिस्म के सड़े गले हिस्से को हमारी बॉडी खाने लगती है। शरीर की इस प्रक्रिया को ऑटोफैगी कहते हैं। इससे कैंसर होने परसेंटेज कम होते हैं। इसके जरिए शरीर के कई वो हिस्से सही हो जाते हैं, जो कैंसर का कारण बन सकते हैं। ऑटोफैगी के आविष्कार के लिए जापान के डॉक्टर योशीनोरी ओशोमी को 2016 का नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। योशीनोरी ओशोमी की रिपोर्ट के मुताबिक अगर कोई इंसान 20 से 25 दिनों तक 10 से 11 घंटे भूखा रहता है, तो उसका शरीर किसी कंप्यूटर की तरह रिबूट हो जाता है। इससे शरीर के सड़े गले पदार्थ का सफाया हो जाता है और कैंसर होने का खतरा कम हो जाता है। रमजान में सही रूप से खाने से खून में कोलेस्ट्रॉल के स्तर को कम करता है।
रोजा रखने से हमारे पाचन तंत्र को आराम करने का वक्त मिल जाता है। उस वक्त शरीर की बची हुई एनर्जी हमारे शरीर के डैमेज सेल को रिपेयर करने में भी काफी कारगर होती है। रोज़ा रखने से हमारे शरीर में उपलब्ध ग्लूकोज़, एनर्जी में तब्दील होने लगती है। इससे शुगर लेवल भी कम होता है। रमजान में अगर हम सेहरी और इफ्तार में ज्यादा कार्बोहाइड्रेट वाले खाद्य पदार्थ का इस्तेमाल नहीं करते हैं। इसके साथ ही अस्वास्थ्य भोजन से भी दूर रहते हैं तो आप आसानी से अपने वजन को कंट्रोल कर सकते हैं।