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बचपन में शरारती था, घरवालों ने व्यस्त रखने को स्पोर्ट्स में डाला, अब इंटरनेशनल लेवल तक का सिलसिला शुरू : विकास ठाकुर

3 वर्ष पहले
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स्पोर्ट्स रिपोर्टर.लुधियाना। रेलवे कॉलोनी में रहने वाले भारतीय वायुसेना में कार्यरत 25 साल के विकास ठाकुर ने कहा कि उनकेे स्पोर्ट्स पर्सन बनने की कहानी बड़ी दिलचस्प है। उन्होंने बताया कि बचपन में शरारती था, घरवालों ने बिजी रखने को स्पोर्ट्स में हिस्सा दिलाना शुरू कर दिया। पहले एथलेटिक की, फिर रेस्लिंग लेकिन उसमें मन नहीं लगा। फिर लुधियाना क्लब ज्वॉइन किया। शुरुआत के 4-5 साल तो ऐसे ही काट दिए। इसके बाद 2008 में डिस्ट्रिक्ट चैंपियन बना, तो नेशनल और इंटरनेशनल लेवल तक का सिलसिला शुरू हो गया जो अब जारी ही रहेगा। विकास ने बताया कि मेरा अगला लक्ष्य एशियन गेम्स, नेशनल और वर्ल्ड चैंपियनशिप है। पापा के मोटिवेशन से ही इस मुकाम तक पहुंच पाया हूं। स्टेशन पर पहुंचने पर घरवालों और दोस्तों ने जिस तरह से स्वागत किया उससे दिल खुश हो गया।

बैक पेन के बाद भी लिया हिस्सा

खन्ना के 22 साल के गुरदीप सिंह सेंट्रल रेलवे मुंबई में कार्यरत हैं। कॉमनवेल्थ गेम्स में 105 किलोग्राम से ज्यादा भारवर्ग की स्पर्धा में पदक से चूक गए। गुरदीप को स्पर्धा में चौथा स्थान मिला। इससे पहले तीन नेशनल रिकॉर्ड ब्रेक कर चुके गुरदीप सिंह ने कहा कि ट्रेनिंग में बैक प्रॉब्लम हो गई थी, जो गेम्स के दौरान भी सही नहीं हो पाई। पूरी कोशिश की, लेकिन मेडल लाने में कामयाबी नहीं मिली। हालांकि, 175 का रिकॉर्ड बना लिया। अब एशियाई और वर्ल्ड चैंपियनशिप की तैयारी के लिए जुट जाऊंगा। इस बार मेडल न मिलने का मलाल है, लेकिन खुशी है कि इंजरी के बाद भी हिस्सा लिया और बेस्ट देने की कोशिश की।

पढ़ाई से ज्यादा खेल को दिया समय

23 साल के प्रदीप सिंह मूल रूप से गांव जंडियाला मंजकी के रहने वाले हैं और लुधियाना रेलवे स्टेशन पर बतौर टीटी कार्यरत हैं। प्रदीप ने कहा कि 105 किलोग्राम वेटलिफ्टिंग कैटेगरी में सिल्वर मेडल जीतकर वह काफी खुश हैं। नवंबर में होने वाली वर्ल्ड चैंपियनशिप में भी गोल्ड जीतकर लाना है। स्कूल की 5वीं क्लास से ही वेटलिफ्टिंग शुरू कर दी थी। वेट लिफ्टिंग का जनून था, इसलिए पढ़ाई से ज्यादा खेल में ही ज्यादा समय बिताया। पिता स्व. अमरीक सिंह की साल 2014 में कैंसर से मौत हो गई थी। उन्होंने हमेशा ही स्पोर्ट्स को लेकर मोटिवेट किया। उनके जाने के बाद मां जसविंदर कौर और छोटी बहन सुखप्रीत कौर का हमेशा साथ रहा है।

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