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जीवन तो मिला, जन्म कहां लिया, इससे ज्यादा महत्वपूर्ण है जीवन को कैसे जिया

3 वर्ष पहले
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दरेसी रोड नजदीक एमजेएस हॉस्पिटल स्थित श्री आत्म वल्लभ आराधना स्थल धर्म कमल हाल में जैनाचार्य श्रीमद् विजय नित्यानंद सूरीश्वर जी मसा के सानिध्य में चल रहे चातुर्मास में दैनिक प्रवचन सभा का आयोजन हुआ। सर्वप्रथम गुरु महाराज द्वारा मंगलाचरण का उच्चारण किया। फिर कार्याध्यक्ष मुनि मोक्षानंद जी ने फरमाया कि जन्म लिया, जीवन मिल गया और मृत्यु भी हमारे हाथ में नहीं है। जीवन मिला जन्म कहां लिया इसका कोई महत्व नहीं, लेकिन जीवन कैसे जिया इसका महत्व है। जो दौलत और सामान हम इकट्ठा कर रहे हैं यह साथ में नहीं जाएगा। इतना सब जानते हुए भी हम कषायों का कचरा इकट्ठा कर रहे हैं। परमात्मा की वाणी रूपी हीरे मोती छोड़ रहे हैं। यह कभी नहीं सोचा जब हम संसार से जाएंगे तो अंतिम पल कैसा होगा। हम पांच इंद्रियों से क्या-क्या इकट्ठा कर रहे हैं। अगर कोई एक्सरे मशीन होती जो हमारे विचारों को देख सकती तो शायद हम खुद भी अपने विचारों को देखना नहीं चाहते। हम प्रतिदिन प्रवचनों में आते हैं तो कभी हमने सोचा कि परमात्मा की वाणी रूपी मोती इकट्ठा करने के लिए क्या उत्तम पात्र बन पाए हैं या नहीं। जैसी वस्तु वैसा पात्र होना चाहिए।

दरेसी रोड नजदीक एमजेएस हॉस्पिटल स्थित श्री आत्म वल्लभ आराधना स्थल धर्म कमल हाल में प्रवचन करते जैनाचार्य श्रीमद् विजय नित्यानंद सूरीश्वर जी। (दाएं) श्रवण करते हुए श्रद्धालु। फोटो : भास्कर

संयम करने में है शक्ति और शक्ति ही जीवन में आनंद की बुनियाद

श्री पीयूष मुनि महाराज ने महावीर भवन सिविल लाइंस स्थित चातुर्मासिक धर्म सभा मंे िदए प्रवचन

लुधियाना| उप प्रवर्तक श्री पीयूष मुनि जी महाराज ने महावीर भवन सिविल लाइंस में चातुर्मासिक धर्म सभा में कहा कि आत्मिक बल बढ़ाने के लिए इंद्रिय निग्रह जरूरी है। प्रकृति में सब कुछ नियमबद्ध और मर्यादित है। अतः मानव को भी अपना जीवन नियंत्रित और मर्यादित बनाना चाहिए। अनियंत्रित जीवन में सभी शक्तियों की प्रतिष्ठा नहीं हो सकती। सदाचार का उद्देश्य केवल संयम है। संयम में शक्ति है और शक्ति ही आनंद की बुनियाद है। संयम से आत्मबल, मनोबल तथा शारीरिक बल बढ़ते हैं। अंतर्द्वंद तथा वासनाओं का दमन होता है और एकाग्रता बढ़ती है। सबसे अधिक शक्तिशाली वह है जो मन को अपने वश में कर लेता है। इंद्रिय दमन के अभ्यास से जीवन सहनशील और शक्तिशाली बनता है। इंद्रिय संयम का एक ऐसी औषधि है जिसे लेने से स्वास्थ्य सुधरता है और पारमार्थिक स्वास्थ्य मिलता है। जिसकी इंद्रियां उसके वश में है उसकी बुद्धि स्थिर है। संयमहीन व्यक्ति का जीवन बिना पतवार की नौका के की तरह डांंवा डोल रहता है। काम वासनाओं को रोक कर ध्यान और समाधि का अभ्यास करना मुश्किल है। परंतु पराक्रम और पुरुषार्थ से कठिनाइयां दूर हो जाती हैं। पथ अड़चनों से रहित हो जाता है।

परमात्मा की वाणी के लिए स्वच्छ और उचित मन चाहिए

जैनाचार्य श्रीमद् विजय नित्यानंद सूरीश्वर जी ने कहा कि हमारा मन जब तक साफ नहीं होता और इसमें जो विषय वासना का कचरा भरा हुआ है। जब तक इसको साफ नहीं करते तब तक भगवान की वाणी को मन में भरना बेकार है। अगर भगवान की वाणी को इकट्ठा करना है तो वैसा पवित्र पात्र भी बनाओ। जैसे शेरनी के दूध को इकट्ठा करना हो तो सोने का पात्र चाहिए और किसी पात्र में वह नहीं टिकेगा। इसी प्रकार परमात्मा की वाणी के लिए स्वच्छ और उचित पात्र चाहिए। पहले मन को स्वच्छ करो। धर्म की शुरुआत स्वच्छ मन से होती है। धार्मिक क्रियाएं इस मन को साधने के लिए हैं। अगर मन भटकता है तो इसे मारो मत, इसे साधो। सांसारिक पदार्थों में सुख नहीं है सिर्फ सुख का आभास है। इसी कारण व्यक्ति तनाव चिंता में है। उसका मन भटक रहा है। चाहे टीवी हो, सिनेमा हो, मोबाइल हो। कई ऐसे साधन खुल गए हैं जिससे मन में कचरा ही भरता है। हम धर्म भी करते जा रहे हैं और कर्म भी बांधते जा रहे हैं। व्यक्ति मन का मन धर्म स्थान पर रह कर भी कभी-कभी अधर्म की तरफ चला जाता है तो उसे मन के भावों के अनुसार ही फल मिलता है। जिस मन में हमें परमात्मा की वाणी को ग्रहण करना है तो पहले उसके लिए पवित्र पात्र को तैयार करो। इस मन रूपी कुएं में क्रोध, मान, माया, लोभ न जाने कितनी गंदगी भरी है। पहले अपने मन रूपी कुएं को साफ करो। तभी भगवान की वाणी भरी जा सकती है। चित्त की शुद्धि से ही आत्मोत्थान का मार्ग प्रशस्त होता है। जिनवाणी के इच्छुक प्राणी को सर्वप्रथम अपने मन की मलिनता को दूर करके पात्र को पवित्र बनाने का पुरुषार्थ आरंभ कर देना चाहिए।

इंद्रियों को जीतने के साथ मन को भी जीतना जरूरी

मुनि श्री जी ने कहा जिसने चंचल इंद्रियों को जीत लिया है।जिसके हृदय में संयम के प्रति पूर्ण और अविचलित श्रद्धा है। जिसने मन, वाणी और शरीर पर विजय प्राप्त कर ली है। उसी महापुरुष को संयम में जागृत कहा जाता है। इंद्रियों को उनके विषयों में आसक्त होने से रोक लेना जरूरी है। शरीर को धारण करने के लिए सभी कार्य व्यवहार आवश्यक हैं। परंतु उनमें आसक्ति नहीं होनी चाहिए। सुन कर, देख कर, सूंघ कर, खा कर तथा छू कर भी जो व्यक्ति खुश अथवा गम हीन नहीं होता वही इंद्रियों का विजेता बनता है। इंद्रियों को जीतने के साथ-साथ मन को भी जीतना जरूरी है। मन को जीतने वाला सच्चा शूरवीर है। आत्मा अत्यंत शक्तिशाली है और सारी शक्तियों का सोत्र है। परंतु उसे सही मार्ग पर तभी ले जाया जा सकता है जब उस पर नियंत्रण कर लिया जाए। प्रभु भक्ति रूपी सोने को छोड़कर इंद्रियों की तृप्ति रूपी मिट्टी का व्यापार नहीं करना चाहिए। काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार हृदय में दुबक कर बैठे रहते हैं और अवसर पाते ही मन को अपने फौलादी पंजों से जकड़ने का प्रय| करते हैं। इनकी जकड़ से छूट कर भगवान के पास पहुंचना मुश्किल हो जाता है। मन को अडिग बनाए रखने का प्रय| जरूरी है। बड़े कौशल से तथा आकर्षण पूर्वक मन को उलझाना इनका काम है। असंयमी व्यक्ति अपना आत्म विकास नहीं कर सकता। मन तथा इंद्रियों पर संयम ना रखने वाला पथ से भटक जाता है।

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