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एक ही वस्तु कभी सुख, कभी दुख दे तो समझ लें कोई भी पद्धार्थ सुखमय नहीं: कृष्णाचार्य

3 वर्ष पहले
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श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर दीप नगर में चल रही शिव महापुराण की कथा में आज विश्व मंगल सेवा संस्थान के कृष्णाचार्य जी महाराज ने कथा के परवाह को आगे बढ़ाते हुए कहा कि जब एक ही वस्तु कभी सुख देने वाली और कभी दुख देने वाली बन जाए तो निश्चित समझे कि संसार का कोई पद्धार्थ सुखमय नहीं है। यह सुख और दुख तो मन के विहार है, ज्ञान की पराकाष्ठा है। उन्होंने कहा कि ज्ञान ही वास्तविक बोध का कारण है।

कृष्णाचार्य जी ने बताया कि भगवान शिव कहते है कि जब मनुष्य का बांया हाथ लगातार एक सप्ताह तक फड़कता रहे तो उसका जीवन एक महा ही शेष जानो। जब सारे अंगों में अंगो में अंग़ाई आने लगे तालूसुख जाए, तब भी मनुष्य का जीवन एक माह ही शेष रह जाता है। कृष्णाचार्य जी महाराज ने उपासना के तीन मार्ग बताते हुए कहा कि ज्ञानयोग, किरया योग र भक्ति योग। भक्ति योग मोक्ष को देने वाला है। चित और आत्मा के साथ जो संयोग होता है उसे ज्ञान योग कहते है। संसार की बाहरी वस्तुओं कोसाथ जो संयोग होता है उसे किरया योग कहते है। देवी देवता के साथ आत्मा की एकता की भावना को भक्ति योग कहते है। इस दौरान उमा संहिता की चर्चा करते हुए कृष्णाचार्य जी महाराज ने कहा कि जो भी देवी का मंदिर का निर्माण करवाता है उसकी हडार पीढियों का उद्धार हो जाता है। इस दौरान भोले बाबा के भजनो से कृष्णाचार्य ने सबको आनंदित किया।

श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर दीप नगर में शिव महापुराण कथा सुनती हुई संगत।

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