किसी को उसके पैर देना समाज को दिया सबसे बड़ा प्रतिदान है
स्टोरी 1 : 23 फरवरी 2018 को ‘हां, तुम कर सकते हो’ या ‘तुम अद्भुत प्रदर्शन कर रहे हो,’ वॉव सुपर’ ‘हां एकदम ठीक’ जैसे नारे हवा में उछाले जा रहे थे, तब तमिलनाडु के कृष्णागिरी में ‘वॉक इंडिया’ कैम्पेन में सौ से कुछ ज्यादा भागीदार उत्साह बढ़ाने वालों की तरफ देखकर मुस्कराते हुए आगे बढ़ रहे थे। भागीदारों की उम्र पांच से 85 वर्ष तक की थी। उत्साह बढ़ाने वाले शब्द दुर्लभ थे और शायद ही उन्हें किसी स्पर्धा या मैराथन में सुना गया हो। क्योंकि प्रतियोगिता में भाग लेने वाले विकलांग थे!
इसे पुनर्बसाहट के क्षेत्र में पोस्ट ग्रेजुएशन करने वाले डॉ. एस. सुंदर के नेतृत्व वाले फ्रीडम ट्रस्ट ने केविनकेयर इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के साथ मिलकर आयोजित किया था। 2016 में शुरू किए गए वॉक इंडिया कैम्पेन ने 300 से ज्यादा विकलांगों को अपने पैरों पर चलने में मदद की है। यह कैम्पन तैयारी के कई चरणों की शृंखला के माध्यम से काम करता है ताकि किसी कारण से अपने अंग गंवा चुके लोगों को कृत्रिम अंग दिए जा सके। कैम्पेन के कार्यकर्ता चुने हुए जिलों में जाकर योग्य उम्मीदवारों की पहचान करते हैं। हालांकि, योग्य व्यक्तियों की पहचान तो सिर्फ बुनियादी कदम है। उसके बाद काउंसलिंग के कई दौर होते हैं, क्योंकि उनमें से ज्यादातर लोग ग्रामीण भारत में कृत्रिम अंग के इस्तेमाल को लेकर आशंकित रहते हैं। फिर कार्यकर्ता हेल्थ कैम्प आयोजित करते हैं, जहां विकलांग अपना नाप देते हैं ताकि तैयार उत्पाद देने की बजाय उनके शरीर के मुताबिक उचित कृत्रिम अंग दिए जा सके।
कैम्प में आने वाले विकलांगों को अामदनी अथवा समुदाय संबंधी किसी प्रकार के प्रमाण-पत्र पेश नहीं करने होते हैं और न कृत्रिम अंग स्वीकार करने वालों की कोई संख्या तय होती है। यह प्रोग्राम गांवों के टूअर और विकलांगों को नि:शुल्क दिए जाने वाले कृत्रिम अंगों के नाप लेने के लिए एक वैन का इस्तेमाल करता है, जिसमें खासतौर पर आवश्यक उपकरण लगे होते हैं। अब 58 वर्ष की उम्र में सुंदर को विकलांगों की सेवा करने के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। इसके पहले उन्हें कई अन्य पुरस्कार व सम्मान मिल चुके हैं। चूंकि उन्हें अहसास हुआ कि फोन व इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के सर्विस सेंटर तो बहुत हैं पर कृत्रिम अंगों के लिए एक भी नहीं, डॉ. सुंदर उन जगहों पर माह में एक कैम्प जरूर लगाते हैं, जहां कृत्रिम अंगों को सर्विस की जरूरत होती है।
स्टोरी 2 : तमिलनाडु के ही तिरुचिरापल्ली में जन्मे 55 वर्षीय इन डॉक्टर महोदय ने मद्रास वेटरिनरी कॉलेज से ग्रेजुएट कर मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी से एक्वाइन (घोड़े व इसके जैसे जानवर) इंटरनल मेडिसिन का अध्ययन करने की स्कॉलरशिप हासिल की। फिर कॉर्नेल यूनिवर्सिटी से ब्लैकस्मिथ टेक्नोलॉजी (लोहार के काम संबंधी) में एडवान्स कोर्स किया और अब पिछले कई वर्षों से पुणे को अपना घर बना लिया है। वे भारत में अपनी तरह के अलग ही पशु चिकित्सक है, जो खासतौर पर घोड़ों के विशेषज्ञ हैं।
वर्ष 2016 में डॉ. बी. रामानाथन ने अपना वेटरिनरी जॉब छोड़ा और पुणे में घोड़ों को वापस उनके पैरों पर खड़े करने लायक बनाने के लिए कॉम्प्रेहेन्सिव एक्वाइन सर्विसेस की स्थापना की। घोड़ों को लेकर किसी इमरजेंसी स्थिति से निपटने के लिए रामानाथन ने अपनी पिक-अप वैन को बदलकर उसमें फर्नेस की पूरी व्यवस्था की है। इसमें हथौड़े और शिकंजे हैं, लोहे व स्टील को पीटकर आकार देने के उपयोग में आने वाला एनविल है, खासतौर पर बनाया गया नाप लेने का टेप और जीवाणुरहित किए गए दस्तानों सहित कई अन्य चीजें हैं। बक्साभर के घोड़ों की दवाइयों के साथ सबसे महत्वपूर्ण घोड़े की नाल बनाने के लिए स्टील व एल्यूमिनियम की शीट्स हैं।
घोड़ों से संबंधित किसी भी खेल मंे जख्मी घोड़े के लिए एकदम सटीक नाल बनाना कोई आसान काम नहीं है, क्योंकि इसमें दर्द का स्रोत पता करने के लिए वैज्ञानिक पद्धति अपनाने की जरूरत होती है। यदि छह वर्ग इंच का पैर आधे टन के वजन को ठीक से संभाल न पाए तो घोड़े के लिए यह और भी दर्दनाक हो जाता है। क्योंकि यदि असंतुलित पैरों के साथ घोड़ा जमीन पर आता है तो टेंडिनाइटिस कभी भी हो सकता है। यहां तक कि नाल में 2-3 मिमी का बदलाव भी घोड़े की अत्यधिक मदद कर सकता है।
फंडा यह है कि  मानवीय इच्छाशक्ति हम जैसे लोगों को समाज के लिए कुछ अलग करने की चुनौती देती है तो कई विकलांगों को भी अपने पैर फिर हासिल करने में भी मदद करती है।
एन. रघुरामन
मैनेजमेंट गुरु
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