गौरेया को बचाने का प्रयास महाप्रभु वल्लभाचार्य स्नातकोत्तर महाविद्यालय के स्पोर्ट्स स्टूडेंट कर रहे हैं। इन्होंने कॉलेज परिसर में स्थित पेड़ों पर मिट्टी के 20 से अधिक सकोरा लगाया है। ताकि गौरेया को रोजाना दाना-पानी मिल सके। यही नहीं पेड़ों की छांव में वो अपना घोसला भी बना सके।
कम हो रही गौरेया की संख्या : कॉलेज स्टूडेंट्स कपिल, मुकेश पेदरिया, ममता ध्रुव, तपस्विनी, बेनजीर खान ने बताया कि बढ़ते शोरगुल व मोबाइल टावरों के रेडिएशन की वजह से गौरेया की संख्या कम हो रही है। इसे देखते हुए पक्षी की प्रजाति विलुप्त न हो जाए इस कारण से ऐसा किया जा रहा है।
पक्षियों का जीवनदाता गांव है सोरिद : सोरिद जहां धान की बाली और मिट्टी के पात्र ये चिड़ियों को दाना और पानी देने की परंपरा है। आदिवासी बाहुल्य इस गांव में 1500 घर है। ग्रामीणों ने बताया कि गांव के प्रत्येक किसान और मजदूर के घर में धान की बाली से पिंजरा बनाते है। पक्षियों को मारने पर गांव में दंड का प्रावधान भी है।
पीजी कालेज में पक्षियों के पानी रखने के लिए कटोरा तैयार करते हुए विद्यार्थी।