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40 साल में आया सामाजिक बदलाव

3 वर्ष पहले
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समाज में अंगद के पैर की तरह जमीं कुरीतियों या फिजूल खर्च वाली परंपराओं के खिलाफ आवाज उठाओ तो रिश्तों के साथ जिंदगी भी दांव पर लग जाती है। इरादे मजबूत हों तो बदलाव दूर नहीं। बदलाव की यह बयार अब जिले के 93 गांवों के 10 हजार पाटीदार परिवारों में चल पड़ी है। 70 हजार आबादी इस समाज की है। युवा पीढ़ी ने मृत्यु भोज (मौसर) पंगत से किनारा कर लिया है। इससे बची राशि बालिका शिक्षा और परोपकार के कार्यों में खर्च की जा रही है। अब समाज बेटियों के चूल्हा-चौका तक सीमित रहने की संकीर्ण सोच से ऊपर उठकर उनके सपनों को नई उड़ान देने में जुटा है।

इसका श्रेय समाज के प्रबुद्ध वर्ग को जाता है, जिनमें कोई सेवानिवृत्त जज, वेटनरी डॉक्टर, अध्यापक तो कोई पटवारी है। इनके प्रयासों ने समाज को जागरूक किया और आज अकेले मनासा विधानसभा में ही 35 गांवों के 3281 परिवार में मृत्यु भोज या मौसर पर दो से ढाई लाख रुपए तक खर्च करने के बजाय समाज की धर्मशाला, बच्चों के लिए छात्रावास, सरकारी स्कूल में दान करना अच्छा मानते हैं। पाटीदारों का सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक स्तर उठाने की दिशा में समाज काम कर रहा है। मंदसौर और नीमच जिले में बालक-बालिका शिक्षा के लिए छात्रावास का निर्माण कराया गया है। शादियों में फिजूल खर्ची रोकने के लिए सामूहिक विवाह का आयोजन होने लगा है। बाल विवाह जैसी कुरीति भी अब नहीं रही।

जिले के 93 गांवों के पाटीदार समाज के युवाओं ने किया मृत्यु भोज से किनारा, बची राशि से कर रहे परोपकार

पहले मौसर नहीं देने की बात करने पर कर देते थे समाज से बाहर, अब फिजूलखर्ची छोड़ बालिका शिक्षा में कर रहे खर्च

मृत्युभोज के पैसों से बनवाया स्कूल में कक्ष, श्मशान में टंकी

पशु चिकित्सक डॉ. राजेश पाटीदार बताते हैं 40 वर्ष पहले पिता शिवनारायण ने मल्हारगढ़ तहसील के बालाखेड़ा में मृत्युभोज का विरोध किया तो समाज से बहिष्कृत कर दिया गया। समाज के वरिष्ठ मृत्युभोज के पक्ष में तो युवा विरोध में थे। गांव में जब बैठकें होती थीं तो उनके पिता रूढि़वादियों के साथ और वे सुधारवादी धड़े के साथ खड़े नजर आते थे। ऐसे में उन्होंने 37 वर्ष पूर्व बहन की मौत पर मौसर पंगत न देते हुए 2.50 लाख रुपए से नारायणगढ़ कन्या हायर सेकंडरी स्कूल में एक अतिरिक्त कक्ष का निर्माण करवाया। समाज में आलोचना हुई। 1989 में दादी के निधन पर धर्मशाला में एक लाख रुपए दान किए। इससे पूर्व 4 भाई-बहनों, बेटी और बुआ के निधन पर श्मशान में पानी की टंकी, स्नान घाट, धर्मशाला और छात्रावास निर्माण जैसे कामों में सहयोग किया।

पहले दो दिन तक चलता था मौसर

पाटीदार समाज तहसील महामंत्री राकेश पाटीदार ने बताया समाज में जागरूकता से अब लोग मृत्यु भोज गृहण नहीं करते। वेशोकाकुल परिवार को सांत्वना देकर लौट आते हैं। 40 साल पहले मौसर दो दिन तक होता था। 3000 मेहमानों के लिए भोजन जिसमें मिष्ठान अनिवार्य था। धीरे-धीरे जागरूकता के साथ समाज में बदलाव आया और अब शोकसभा में संवेदना व्यक्त की जाने लगी है। पहले समाज सुधारवादी और परंपरागत रूढ़िवादी दो धड़ों में बंटा रहता था। युवाओं को समाज से बहिष्कृत तक किया गया। उन्हें उलाहने और अपमान सहना पड़ा। आखिरकार 40 साल बाद परिवर्तन दिखाई देने लगा।

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