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बचने वाली फीस के पैसे से शासकीय भवन का करेंगे जीर्णोद्धार

3 वर्ष पहले
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मनावर के समीप स्थित ग्राम जाजमखेड़ी के करीब 65 बच्चों के पालकों ने अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूल में नहीं भेजने का बीड़ा उठाया है। उन्हें शासकीय स्कूल में दाखिला करवाने की ठान ली। बच्चों की जो फीस प्राइवेट स्कूलों में खर्च की जाती है। उन पैसों से उस शासकीय स्कूल का जीर्णोद्धार करेंगे। वहां पर फर्नीचर की व्यवस्था करना एवं अगर पढ़ाने के लिए शिक्षक उपलब्ध नहीं है तो शिक्षक की व्यवस्था करने का कार्य करेंगे, तथा स्कूल में स्मार्ट क्लास लगवाने हेतु भी पहल करेंगे। पालकों का कहना है कि ग्राम जाजमखेड़ी के कक्षा पहली से लेकर आठवीं तक के करीब 65 बच्चे मनावर की विभिन्न प्राइवेट स्कूलों में पढ़ते हैं तथा प्रतिवर्ष 30 लाख रुपए बच्चों के पालक फीस के रूप में प्राइवेट संस्थाओं में जमा करते हैं। इन सब के बाद भी प्राइवेट संस्थाएं मनमानी फीस वृद्धि कर देती है, जिसका बोझ पालकों को वहन करना होता हैं। ऐसी स्थिति में अगर सभी पालक चाहे तो शासकीय स्कूलों को गुणवत्ता युक्त बनाया जा सकता है। अगर हम अपने बच्चों को पढ़ने भेजेंगे तो निश्चित रूप से जो गरीब बच्चे पढ़ रहे हैं उन्हें भी अच्छी शिक्षा उपलब्ध हो पाएगी। 2200 की जनसंख्या वाली ग्राम पंचायत जाजमखेड़ी में अधिकतर खेतिहर किसान परिवार ही निवासरत हैं। यहां पर मिडिल तक शासकीय स्कूल हैं जिसमें पहली से पांचवीं तक 48 बच्चे छठी से आठवीं तक 22 बच्चे अध्ययनरत हैं। विद्यालय में करीब 8 शिक्षकों का स्टाफ हैं।

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मनावर के जाजमखेड़ी गांव का मामला, निजी स्कूल के बजाए सरकारी स्कूल में पढ़ाएंगे अपने बच्चे

निजी स्कूल में 30 प्रतिशत फीस बढ़ाने पर लिया निर्णय

बीते दिनों मनावर के एक निजी स्कूल द्वारा 30 प्रतिशत की राशि फीस में बढ़ोतरी की जाने को लेकर पालकों द्वारा वहां धरना दिया गया था। उसी दिन जाजमखेड़ी के पालकों द्वारा यह निर्णय लिया कि वह अब प्राइवेट स्कूलों की बजाय अपने गांव की सरकारी स्कूल का ही कायाकल्प करेंगे तथा निजी सहयोग से ही स्कूल को आदर्श स्कूल बनाने के लिए पूर्ण प्रयास करेंगे। इसके लिए उन्होंने एक समिति भी गठित कर ली है। जाजमखेड़ी के पालकों के निर्णय से निश्चित ही पालकों को धन की बचत होगी तो शासकीय स्कूलों की शिक्षा की गुणवत्ता में भी सुधार होगा।

क्या कहते हैं जाजमखेड़ी के पालक

सोहन सेप्टा का कहना है बेहतर शिक्षा के चक्कर में हम शिक्षा पर ही इतना पैसा खर्च कर देते हैं कि प्रतिस्पर्धी परीक्षा के दौरान खर्च करने के लिए कुछ भी नहीं बचता है। ऐसी स्थिति में परिजन अपने सबकुछ बेचने को तैयार हो जाते हैं।

मोहन चौहान का कहना है अगर हम सभी पालक मिलकर बच्चों को सरकारी स्कूल में भेजें और प्राइवेट स्कूल की फीस का 25 प्रतिशत भी शासकीय स्कूल पर खर्च करें तो स्कूल के कायाकल्प के साथ ही हमारी आर्थिक स्थिति भी सुदृढ़ रहेगी।

राजू चोयल का कहना है खेतिहर मजदूरों के बेटे-बेटियों का भी शिक्षा का स्तर सुधरेगा तथा ऐसे शिक्षक जो स्कूल में पढ़ाई के दौरान सिर्फ समय व्यतीत करते हैं। वे भी पढ़ाई पर ध्यान देंगे।

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