अनौपचारिक बैठक से वार्ता का माहौल बनता है
अनौपचारिक वार्ता किसी ट्रीटी या एग्रीमेंट का हिस्सा नहीं बनती। लंबे वक्त से भारत, रूस से कटा-कटा है। जितना हम अमेरिका के करीब आते गए, रूस दूर होता गया। आज दो पोल बन गए हैं, एक- एशिया-पैसिफिक में जापान, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका। दूसरा- गल्फ में चीन, रूस, सीरिया, ईरान है। भारत को इसमें बैलेंस बनाना है। लिहाजा मोदी को प्रतिनिधिमंडल के साथ जाने के बजाय अनौपचारिक वार्ता ज्यादा सही लगता है। चूंकि अनौपचारिक मुलाकात में एजेंडा तय नहीं होता है। इसीलिए जब देशों के प्रमुख बैठते हैं तो बातचीत का माहौल तैयार होता है।