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ढावा की लाल मिट्टी आज भी गवाह है तांबे के खान की, यहां ढलते थे तांबे के सिक्के

3 वर्ष पहले
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भास्कर संवाददाता| मेड़ता सिटी (आंचलिक)

मेड़ता शहर से 22 किलोमीटर दूर ढावा गांव के पहाड़ी की लाल मिट्टी आज भी इस बात की गवाह है कि यहां तांबे की खान थी। यहां रियासतकाल के दौरान तांबे के सिक्के ढलते थे। ये सिक्कों की टकसाल थी। साथ ही यहां तांबे के बर्तन व औजार भी बनते थे। लेकिन अब यहां ऐसा कुछ नहीं है, फिर भी गांव से सटी पहाड़ी की लाल मिट्टी आज भी यहां कभी तांबे की खान होने की गवाही दे रही है। आस पास में पुरा संपदा भी बिखरी पड़ी है। विभिन्न इतिहासकारों के अनुसार 8वीं से 13वीं सदी तक इस भू-भाग पर प्रतिहार, गुहिलोत, चौहान, नागवंशीय शासकों का शासन रहा है। नागभट्ट द्वितीय की राजधानी मेड़ता रही थी। इस क्षेत्र का प्राचीन वैभव 13वीं व 14वीं शताब्दी में चरम पर रहा था। लेकिन 15वीं शताब्दी में मुगल आक्रांताओं ने इन नगरों को लूट कर उजाड़ दिया था। नागौर जिले के सुद्रासन, डीडवाना, लाडनूं, खाटू, कुराड़ा, जनाणा, राजोद, डेगाना व जसनगर क्षेत्र में विभिन्न समय के अंतराल की खुदाई के दौरान पुरा अवशेष मिलते रहे हैं। वहीं डेगाना की रेवंत की पहाड़ी पर बुद्ध कालीन तो मेड़ता, कुराड़ा व ढावा में ताम्रयुगीन सभ्यता के पुरा अवशेष मिले हैं। ढावा गांव से सटे एक खेत में सन 1991 में निकली विभिन्न मूर्तियों की स्थापत्य कला को देखकर पुरातत्ववेता आज भी आश्चर्य जताते हैं। पुरातत्व विभाग अधीक्षक निरंजन पुरोहित ने बताया कि इन मूर्तियों में उमा माहेश्वर, लक्ष्मीनारायण चतुर्भुज विष्णु, त्रिभुज मुद्रा में खड़ी दो मुखी देवी प्रतिमाएं विश्वप्रसिद्ध ब्रह्मा व भगवान विष्णु के अवतार वराह भगवान की 10वीं शताब्दी की यह प्रतिमाएं बीकानेर के संग्रहालय में शोभा बढ़ा रही हैं।

आज स्कूली बच्चों के लिए मीरा स्मारक में रहेगा निशुल्क प्रवेश: मीराबाई स्मारक में बुधवार को विश्व धरोहर दिवस के मौके पर स्कूली बच्चों काे निशुल्क प्रवेश दिया जाएगा।

मेड़ता सिटी. ढावा गांव की पहाड़ी जहां तांबे की खान हुआ करती थी।

मेड़ता शहर से 22 किलोमीटर दूर है ढावा गांव, तांबे के बर्तन व औजार भी बनते थे, 1991 में मिली थी प्राचीन मूर्तियां

अाछोजाई की पहाड़ी, मंदिर में राजा की चरण पादुका की भी होती है पूजा

भास्कर संवाददाता | रियांबड़ी/पादूकलां

नागौर जिले का इतिहास महाभारत कालीन भी रहा है। यहां की ऐतिहासिक धरोहरें, किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं। लेकिन सरकारों व प्रशासनिक उपेक्षाओं के चलते इन धरोहरों की दुर्दशा होती जा रही है। कुछ ऐसा ही हाल डेगाना के पास स्थित कोड्या डूंगरी के नाम से प्रसिद्ध अरावली पर्वतमाला की आछोजाई पहाड़ी के राजा जन्मेजय का जानाजी मंदिर व यहां स्थित तालाब की हो रही है। यहां मंदिर के गर्भ गृह में राजा जानाजी की चरण पादुका व मूर्ति की पूजा होती है। यहां महत्वपूर्ण पौराणिक स्थल होने के बावजूद भी यहां पहुंचने के लिए कोई सीधी सड़क नहीं है। न ही इस पूरे क्षेत्र में इस स्थल से जुड़ी जानकारी का कोई साइन बोर्ड लगा है। किवदंतियों के अनुसार महाभारतकाल में अभिमन्यु के पौत्र राजा जन्मेजय को कुष्ठ रोग हो गया था। कुष्ठ मुक्ति के लिए उन्हें अरावली पर्वतमाला के कोड्या डूंगरी में नहाने को कहा था। ऐसी मान्यता हैं कि यहां नहाने से कुष्ठ रोग दूर हो जाता हैं। इस दौरान जन्मेजय रेवंत डूंगरी पहुंच गए थे। जहां उनकी रेवती नामक घोड़ी ने दम तोड़ दिया था। डेगाना में स्थित इस पहाड़ी पर अाज भी रेवती घोड़ी की समाधि हैं। यहां से वे पैदल ही तामड़ोली गांव पहुंचे। जहां रात्रि विश्राम के बाद उन्होंने अपनी चरण पादुका छोड़ दी थी। यहां लोग आज भी मन्नत पूरी करने के लिए चप्पल चढ़ाया करते हैं। राजा जन्मेजय को लोकदेवता जानाजी के रूप में पूजा जाता है। वहीं जिला पर्यटन विकास समिति सदस्य नरेंद्र सिंह का कहना है कि इस क्षेत्र के पर्यटन, धार्मिक व ऐतिहासिक स्थलों की जानकारी प्रशासन व पुरातत्व विभाग को भेज इन स्थलों को विकसित कराने के प्रयास किए जाएंगे।

आछोजाई में राजा जन्मेजय का मंदिर।

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