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मिट्‌टी की उर्वरा शक्ति बढ़ाने के लिए खेतों में भेड़-बकरियां बैठा रहे किसान

3 वर्ष पहले
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पूनमचंद धाकड़ | केरवासा (जावरा)

राजस्थान से आने वाली भेड़ों को मालवा-निमाड़ के किसान अपने खेतों में बैठाकर मिट्‌टी की उर्वरा क्षमता बढ़ाने में लगे है। कृषि अधिकारियों की मानें तो फसलों के लिए भेड़, बकरियांे और मुर्गियों की बीट (लेंडी) कंपोस्ट खाद से भी ढाई गुना ज्यादा लाभदायक है। एक बार इसका उपयोग होने पर दो साल तक असर रहता है। यही कारण है कि क्षेत्र के किसान भेड़ों को खेतों में बैठाकर मिट्‌टी की उर्वरा शक्ति बढ़ा रहे है। राजस्थान में प्रयोग सफल होने के बाद अब मालवा-निमाड़ में इसका चलन बढ़ा है।

रबी सीजन समेटने के बाद क्षेत्र में हर साल राजस्थान से भेड़ पालक (रेबारी परिवार) समूह के रूप में भेड़ व बकरियां लेकर आते हैं। इन भेड़ों को क्षेत्र के किसान अपने खेतों में बैठाते है और इसके लिए भेड़ पालकों को 300 रुपए प्रति बीघा नकद राशि के साथ ही पांच किलो अनाज देते है। भेड़ पालक श्यामलाल रेबारी और हरीश रेबारी कहते है दिन में भेड़ों को जंगल में घास व बबुल समेत अन्य पौधे की पत्तियां खिलाते है और रात में इन्हें खेत में बैठाते है। दूसरे दिन दोपहर तक ये खेत में बैठने के दौरान कई बार बीट करते हैं। यही बीट खाद का काम करता है। बीट से किसानों को खेतों में उर्वरा शक्ति बढ़ाने में मदद मिलती है और इससे हमें रोजगार भी मिला हुआ है। भेड़ के दूध से घी तैयार करते है, जो 800 से एक हजार रुपए किलो के भाव बिकता है। कृषि विभाग के एसडीओ एन.के. छारी ने भी इस बात की पुष्टि की है कि भेड़, बकरियों व मुर्गियों की बीट खाद का काम करती है और यह कंपोस्ट खाद से भी ढाई गुना ज्यादा लाभदायक है। दो साल तक इसका असर रहता है।

ढाई गुना ज्यादा फायदेमंद भेड़-बकरी की बीट, दो साल तक रहता है असर

ग्राम भूतेड़ा में किसान सुरेश चंद्रवंशी के खेत में बैठी भेड़ व मौजूद रेबारी परिवार।

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