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साधारण घरों में भी हो सकते हैं सुपर हीरो!

3 वर्ष पहले
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यह आवश्यक नहीं कि सारे सुपर हीरो महंगे मकानों में रहते हों। ऐसे कई हैं जो साधारण घरों में पाए जाते हैं, भीड़ में छिपे हुए। करुणा और दया उनकी सुपर पावर होती है। ठीक ऐसा कोई मुंबई के उपनगर कुर्ला में रहता है, जहां रहने वाला हर व्यक्ति किसी बेहतर जगह जाना चाहेगा।

नब्बे पार के दशक के उत्तरार्ध तक वे बिज़नेसमैन हुआ करते थे और उन्हें एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम करने का 15 साल का अनुभव था। सबकुछ ठीक चल रहा था और फिर एक दिन उन्होंने एक टेंडर में गलत कीमत भर दी और उनकी कंपनी को बहुत बड़ा नुकसान हो गया। इस मूर्खतापूर्ण गलती का सीधा परिणाम यह हुआ कि उन्हें कंपनी छोड़कर जाने को कह दिया गया। तब जाकर उन्हें अहसास हुआ कि उनकी सुनने की क्षमता के साथ कुछ बहुत ही गलत बात है। जांच में पता चला कि उन्हें ‘टिनाइटस’ है यानी कान की ओर जाने वाली धमनियां कठोर हो गई हैं। इसमें ऐसे लगता है जैसे किसी के कान में लगातार घंटी बजने की आवाज या भनभनाहट होती रहे। उन्हें सर्जरी की सलाह दी गई। हालांकि, इससे कोई फायदा नहीं हुआ। इससे उनका डिप्रेशन बढ़ गया और जल्दी ही उन्हें आत्महत्या के खयाल आने लगे। इस कठिन दौर से गुजरते हुए उन्होंने हार मानने से इनकार कर दिया।

वे अपने उदाहरण से नेतृत्व देने में विश्वास करते हैं। इसलिए उन्होंने मुंबई के एक कॉलेज से लेखन और फोटोग्राफी में हाथ आजमाने का निश्चय किया। कुछ ऐसा हुआ कि उन्होंने जितने फोटो खींचे वे बहुत अच्छे आए और वही धीरे-धीरे उनका जुनून बनने लगा। लेकिन, लैंस के पीछे अपना जुनून खोजना, सुनने की तकलीफ भुलाने के लिए पर्याप्त नहीं था। वे जितना इतके बारे में सोचते, उतना चिंतित होते और उसी समय संयोग से उन्होंने एक अन्य उपनगर गोरेगांव में सुनने की तकलीफ वालों का स्कूल ‘संस्कारधाम’ देखा। वे सिर्फ यह चाहते थे कि ये बच्चे बड़े होते हुए आत्मनिर्भर बनें और इसलिए उन्होंने उन बच्चों को फोटोग्राफी सिखाने की पहल की।

राजेन्द्र नायर से मिलिए, जिन्हें मित्रों व परिवार में प्यार से राजेन कहा जाता है। वे लगभग दो दशक से फोटो-जर्नलिस्ट हैं। उन्होंने सुनने में तकलीफ से परेशान धारावी के बच्चों को एक एनजीओ के सहयोग से फोटोग्राफी पढ़ाना शुरू किया। अन्यथा आमतौर पर किसी पेशेवर फोटोग्राफर की सेवाएं लेना आर्थिक रूप से इन बच्चों के बस की बात नहीं थी। सुनने में परेशानी वाले बच्चों को पढ़ाने का यह काम बधिरों के एक स्कूल में हर वीकेंड तीन साल तक चलता रहा। कुछ वर्षों में नायर वैश्विक स्तर पर फोटोग्राफरों का एक नेटवर्क बनाने में कामयाब रहे, जिन्हें वे पाकिस्तान, अफगानिस्तान, रूस और यूरोपीय देशों से समाज के वंचित तबकों के इन बच्चों को पढ़ाने के लिए आमंत्रित करते हैं।

2013 से वे टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल में कैंसरग्रस्त बच्चों को पढ़ाने लगे, जो पिछले पांच वर्षों से जारी है। मुंबई में कोई गली ऐसी नहीं है, जिसकी ज़िंदगी को उनके कैमरे ने न पकड़ा हो। वे बार-बार लैंस से नए एंगल पकड़ने वहां जाते हैं और बच्चों को भी अपनी आंखों से देखकर सीखने का मौका देते हैं। हो सकता है उनमें से कई फोटोग्राफी को पेशे के रूप में न अपनाएं, लेकिन कई बच्चे जो उनके साथ काम करते हैं उन्हें उनके अासपास की दुनिया को अलग कोण से देखने का प्रशिक्षण तो मिल गया और उन्हें ढालने तथा ठीक-ठाक आजीविका खोजने के लिए इतना पर्याप्त है। कम से कम उनके लिए राजेन सुपरहीरो हैं, जिन्होनंे उनकी ज़िंदगी को रंगीन बनाया है।

फंडा यह है कि  जरूरी नहीं सुपरहीरो हवेलियों में रहे, वे साधारण घरों से आकर भी किसी की ज़िंदगी को हवेली की ज़िंदगी बना सकते हैं।

मैनेजमेंट फंडा एन. रघुरामन की आवाज में मोबाइल पर सुनने के लिए टाइप करें FUNDA और SMS भेजें 9200001164 पर

एन. रघुरामन

मैनेजमेंट गुरु

raghu@dbcorp.in

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