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क्या मायावती ने बदला चुनाव का समीकरण?

3 वर्ष पहले
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यह लिखते समय भाजपा की जीत पूरी तरह सील नहीं हुई थी लेकिन, कांग्रेस की पराजय मुक्कमल थी। नरेन्द्र मोदी ने फिर दिखा दिया है कि उनसे राहुल गांधी का कोई मुकाबला नहीं है। पहले भी इसमें संदेह नहीं था पर कर्नाटक के नतीजों ने विशुद्ध अखिल भारतीय नेता के रूप में मोदी के उदय पर मुहर लगा दी है। हमारे राजनीतिक इतिहास में नेहरू व इंदिरा के बाद वे ऐसे सिर्फ तीसरे नेता हैं। इसलिए नतीजे में तीन प्रमुख सबक हैं :

1. गठबंधन की प्रक्रिया अब ऐसी होगी, जो चार दशकों में देखी नहीं गई। जो दल वैचारिक अथवा वोट आधार में भाजपा से इतने भिन्न हैं कि उसके साथ कभी जा नहीं सकते, उनके सामने मोदी के टक्कर की कहानी बुनने की चुनौती होगी। आज यह चुनौती दुर्गम लगती है। यदि वे एकजुट होते हैं और एक नेता चुनते हैं तो मोदी बनाम ए, बी या सी अध्यक्षीय प्रणाली जैसा अभियान आसान होगा। यदि ऐसा नहीं करते तो वे किस्तों में खत्म हो जाएंगे।

जिन दलों पर वैचारिकता का बोझ नहीं है उनके लिए हमेशा ही दिल्ली में आने वाली पार्टी विकल्प होती है ताकि अपना हिस्सा ले सकें। अखिलेश, ममता यहां तक कि मायावती भी लेकिन, वाम दलों के पास यह लचीलापन नहीं है। शरद पवार सहित बाकियों का क्या? खासतौर पर तब जब शिवसेना भाजपा से अलग ही रहे।

यह कैसे होगा? मैं देवेगौड़ा के पुत्र कुमारस्वामी से वॉक द टॉक इंटरव्यू (2006) में मिले जवाब को उद्‌धृत करूंगा। ‘जब भाजपा को बाहर रखने के लिए बनी धर्मनिरपेक्ष एकता ने उनके पिता को प्रधानमंत्री बनाया तो उन्हें भाजपा के समर्थन से मुख्यमंत्री बनते दुविधा नहीं होती? उन्होंने कहा, ‘मेरे पिताजी ने प्रधानमंत्री बनकर बड़ी गलती की, क्योंकि वे राज्य में अपना फोकस गंवाकर यहां पावर खो बैठे। सारे क्षेत्रीय दलों को द्रमुक/अन्नाद्रमुक से सबक लेना चाहिए। अपने राज्य में पावर होगी तो दिल्ली में कोई भी आपको राष्ट्रीय सत्ता में हिस्सा देने को राजी होगा।’ यह अब और भी लागू होता है। फर्क यह है कि चुंबक अब कांग्रेस के प्रभुत्व वाला ‘सेकुलर’ न होकर भाजपा के नेतृत्व का ‘नेशनलिस्ट’ है। आरएसएस विचारक शेषाद्रि चारी कहते हैं कि 2019 में मोदी बनाम ‘कोई नहीं’ होगा तो यह अतिशयोक्ति नहीं है। सवाल यह है कि यह समीकरण सालभर रहेगा? लेकिन, आज कोई विश्लेषण यह संकेत नहीं देता कि समीकरण में बदलाव कैसे होगा?

2. दूसरा सबक यह कि किसी भी त्रिकोणीय चुनाव में भाजपा ही विजेता होगी। यह इतिहास दोहराने का मामला है। इंदिरा गांधी 1969 और 1973 के बीच जो थीं, वही आज नरेन्द्र मोदी हैं। जब सारे नेता व दल उनके खिलाफ एकजुट होते तो उन्हें फायदा मिलता। उन्हें तो सिर्फ यह कहना होता कि मैं ‘गरीबी हटाना चाहती हूं’ और यह सारी एकजुटता सिर्फ मेरे प्रति नफरत के कारण है। कोई वैचारिक आधार नहीं कि यह हताश किस्म का जमावड़ा किसी एक नेता पर सहमत हो जाए।

तथ्य: इमरजेंसी तक यह उनके काम आया और 1977-80 के संक्षिप्त अपवाद के बाद में भी यही हुआ। इंदिरा की जेलों से बाहर आए नेता जनता पार्टी के रूप में इकट्‌ठे हुए पर जैसा उनका अनुमान था, ढाई साल में बिखर गए। भाजपा (तब भारतीय जनसंघ) दूसरे छोर पर थी, अब वहां कांग्रेस है। क्या विपक्ष इससे सीख सकता है और कोई इनोवेटिव आइडिया लाता है। अभी तो हमें कांग्रेस या शेष विपक्ष में ऐसा कोई आत्मपरीक्षण या बौद्धिक पुनर्विचार नहीं दिखता।

3. पुराने मैसूर/दक्षिण कर्नाटक में भाजपा ने एग्जिट पोल अनुमानों से भी बेहतर प्रदर्शन किया। वोकालिंगा और लिंगायतों की उपेक्षा कर ‘शेष’ के साथ गठजोड़ की कांग्रेस की दुस्साहसी रणनीति नाकाम रही। कर्नाटक विविधता भरा चुनाव क्षेत्र है और तीनों में से हर दल ने अपने कॉम्बिनेशन पर फोकस रखा। हमें इससे दो नतीजे अपेक्षित हैं : एक, कोई दल सारी जातियों के परे पूरे राज्य में प्रभाव पैदा नहीं कर सका। दूसरा और ज्यादा महत्वपूर्ण यह कि केवल जद (एस) के लिए यह काम आया। इसके गढ़ में और वहां जहां कांग्रेस को इससे सीटे छीनने की उम्मीद थी। यहां नया तत्व मायावती है, जिन्होंने जद (एस) का समर्थन कर प्रचार भी किया। क्या उन्होंने उन दलित वोटों का रुख मोड़ा, जिसकी कांग्रेस को अपेक्षा थी? हम अभी नहीं जानते। लेकिन, लगता नहीं कि दलित वोट नहीं बंटते तो जद (एस) इतना अच्छा और कांग्रेस इतना खराब प्रदर्शन करती। तो क्या मायावती कर्नाटक चुनाव का एक्स फैक्टर है? हमें जल्द ही अधिक स्पष्टता से यह मालूम हो जाएगा। इसीलिए मैं यह कहने का लालच रोक नहीं पा रहा हूं कि उत्तर प्रदेश के खैराना उपचुनाव में जो होगा उसका 2019 के चुनाव पर उतना ही प्रभाव होगा, जितना कर्नाटक 2018 का।

शेखर गुप्ता एडिटर इन चीफ, ‘द प्रिंट’

Twitter@ShekharGupta

2019



सिद्धारमैया को लिंगायत वोटों का दांव उलटा पड़ा

भाजपा का अकेले सामना नहीं कर सकती कांग्रेस

कर्नाटक में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी और कांग्रेस की लगभग पचास सीटें घट गईं, यह नरेंद्र मोदी की पगड़ी में नया मोर-पंख है। इस चुनाव को जीतने के लिए भाजपा ने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था। प्रधानमंत्री और भाजपा अध्यक्ष ने पूरा जोर लगा दिया। अमित शाह ने कर्नाटक का चप्पा-चप्पा छान मारा। 57 हजार किमी की यात्रा की। कर्नाटक का चुनाव 2019 के आम चुनाव का पूर्वाभ्यास था। यदि भाजपा को 130 सीटें मिल जातीं तो भाजपा दावा करती कि 2019 का चुनाव तो जीता-जिताया है लेकिन, कर्नाटक के चुनाव परिणाम भाजपा के लिए सबक है। गुजरात में जान और कर्नाटक में इज्जत बची तो इसके मायने क्या हैं? एक ही संदेश है कि 2019 का रास्ता कांटों भरा है। यह ठीक है कि उसे कांग्रेस से डेढ़ी सीटें मिली हैं लेकिन, सवाल यह है उसे वोट कितने मिले हैं? दोनों पार्टियों का आंकड़ा 35-36 प्रतिशत के आस-पास है। उसके उम्मीदवार काफी कम वोटों से जीते हैं।

यह आंकड़ा उलट भी सकता था बशर्ते कांग्रेस के पास कोई जबर्दस्त नेता होता। फिकरेबाजी में नरेंद्र मोदी को राहुल गांधी मात दें, यह संभव ही नहीं है। स्तरहीन बहस और दोनों की नौटंकियों ने कर्नाटक के चुनाव को एक अलग श्रेणी में ले जा बिठाया। दोनों ने मंदिरों और साधु-संतों के जैसे फेरे लगाए, उसने धर्मनिरपेक्ष राजनीति के धुर्रे बिखेर दिए। सिद्धारमैया का लिंगायत वोटों को पटाने का पासा उलटा पड़ गया। चुनाव में सिद्धांतों, विचारों और नीतियों पर बहुत कम बहस हुई। यह देश के लिए चिंता का विषय है।

इस चुनाव ने भारतीय राजनीति के गहरे चरित्र को भी उजागर किया। सिद्धारमैया और येदियुरप्पा तो किनारे लग गए। सामने आ गए मोदी और राहुल! भारतीय राजनीति एकायामी होती जा रही है। उसमें से द्वंद्वात्मकता घटती चली जा रही है। कांग्रेस में भी सिर्फ एक आवाज है और भाजपा में भी। यह किसी भी लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है।

यह कहना तो और भी खतरनाक है कि भारत अब कांग्रेसमुक्त हो रहा है। कांग्रेस का राज आज चाहे पंजाब, पुडुचेरी और मिजोरम में सिमट गया है लेकिन, आज भी देश का शायद ही कोई ऐसा जिला हो, जिसमें कांग्रेस के निष्ठावान कार्यकर्ता न हों। किसी भी देश को जोड़े रखने के लिए किसी एक विशाल राजनीतिक दल की बेहद जरूरत होती है। सरकारें सिर्फ कर्मचारियों को जोड़े रखती हैं लेकिन पार्टियां आम लोगों को बांधे रखती हैं। सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी के बिखरते ही सोवियत संघ के टुकड़े-टुकड़े हो गए या नहीं? भाजपा देश के गांव-गांव में फैल जाए तो उसका स्वागत है लेकिन किसी समांतर विरोधी दल का जिं़दा रहना भी लोकतंत्र की पहली आवश्यकता है।

यह तथ्य कर्नाटक के बाहर बहुत कम लोगों को पता है कि देवेगौड़ा की पार्टी किसी भी हालत में सिद्धारमैया का समर्थन नहीं करती, क्योंकि सिद्धारमैया कभी देवेगौड़ा के चेले रहे हैं, उनकी पार्टी में रहे हैं और उनके विरुद्ध बगावत भी कर चुके हैं। अब कांग्रेस ने यदि जनता दल (एस) को समर्थन देने की घोषणा कर दी है और कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री बनाना स्वीकार कर लिया है तो इसका वे स्वागत क्यों नहीं करेंगे? 2019 के चुनाव में देवेगौड़ा प्रधानमंत्री पद के सशक्त उम्मीदवार बन सकते हैं। एक दक्षिण भारतीय पूर्व प्रधानमंत्री के नाम पर सारे विरोधी दलों का एका होना कठिन नहीं है। यह लिखे जाने तक साफ नहीं था कि भाजपा को बहुमत मिलता है या नहीं पर यदि नहीं मिलता है तो उसे विरोधी दल की तरह गरिमामय ढंग से पेश आना चाहिए। यदि कर्नाटक में उसने वही किया, जो गोआ और मणिपुर में किया तो 2019 की रणनीति भी प्रभावित होगी।

2019 के आम चुनाव के लिए कर्नाटक चुनाव से पहला सबक तो यही है कि भाजपा का मुकाबला अकेली कांग्रेस कतई नहीं कर सकती। यदि देश के विरोधी दलों को भाजपा का मुकाबला करना है तो उन्हें प्रांतीय स्तरों पर विभिन्न दलों का गठबंधन बनाना होगा, जैसा कि अखिलेश और मायावती के बीच उत्तरप्रदेश में बन रहा है। यदि कांग्रेस और जनता दल (एस) मिलकर चुनाव लड़ते तो कर्नाटक में भाजपा को शायद एक-तिहाई सीटें भी नहीं मिलतीं। यूं भी 2014 में भाजपा को सिर्फ 31 प्रतिशत वोट मिले थे। दूसरा, अगला प्रधानमंत्री कौन बनेगा, इस सवाल पर 2019 के चुनाव के बाद ही विचार किया जाए। कर्नाटक में कुमारस्वामी का नाम अपने आप उभरा या नहीं ? तीसरा, देश की गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा और विषमता दूर करने के लिए सभी विरोधी दलों को ठोस, व्यावहारिक और समयबद्ध कार्यकम लेकर सामने आना चाहिए। सिर्फ चुनाव जीतना ही काफी नहीं है, देश की शक्ल बदलना जरूरी है।

वेदप्रताप वैदिक भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष

dr.vaidik@gmail.com

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