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संगीतमय कथा.. मां ही बच्चे की प्रथम और सच्ची गुरु होती है : कनक महाराज

3 वर्ष पहले
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संगीतमय कथा.. मां ही बच्चे की प्रथम और सच्ची गुरु होती है : कनक महाराज

अशोकनगर| संगीतमय श्रीमद भागवत कथा मधुवन गार्डन में चल रही है। कथा के तीसरे दिन राष्ट्रीय संत कनक महाराज ने बताया कि धरती पर ही स्वर्ग और नरक है। दान की भावना, मधुर वाणी बोलने वाला, देवी देवताओं की पूजन अर्चन करने वाला, संत ब्राह्मणों को तृप्त करने वाला स्वर्ग में निवास करते हैं। भक्त ध्रुव जी की कथा सुनाते हुए उन्होंने कहा कि नारी के तीन रूप होते हैं। पहला लक्ष्मी जो घर चलाने के लिए बनती है। दूसरा चंडी जो समाज सुधारने के लिए आती है और तीसरा सरस्वती जो अपने संतान का संस्कारित बनाने के लिए बनती है। बच्चा जब छोटा होता है तब क्रोध और प्रेम को समझता है लेकिन बोल नहीं पाता यानी उसे आत्म ज्ञान तो है परंतु शब्द ज्ञान ना होने के कारण बोल नहीं पाता। मां ही बच्चे की प्रथम और सच्ची गुरु होती है। मां चाहे तो बालक को डाकू, चोर, शराबी, जुआरी, वेश्या गमी बना सकती है। मां चाहे तो बालक को भक्त दानी शूरवीर बना सकती है यह मां पर ही निर्भर है।

धार्मिक... मित्र को हर परिस्थिति में अपना कर्तव्य निभाना चाहिए : पं. सूर्यप्रकाश

मुंगावली| कुशवाह काॅलोनी में चल रही श्रीमद भागवत कथा का रविवार को पूर्णाहुति के साथ समापन हुआ। कथा के अंतिम दिन कृष्ण सुदामा की मित्रता का प्रसंग सुनाया गया। कथा वाचक पं. सूर्यप्रकाश पाठक जी ने कहा कि दुनिया में कृष्ण सुदामा जैसी मित्रता दूसरी नहीं है। मित्र कैसा भी हो। हर परिस्थिति में मित्र को अपना कर्तव्य निभाना चाहिए। मित्र के दुख को देखकर अगर मित्र दुखी नहीं होता तो उसे मित्र समझना जीवन की सबसे बड़ी भूल है। सुदामा एक गरीब ब्राह्मण थे। फि र भी कृष्ण अपने मित्र को दरवाजे से नंगे पैर लेने भागे और अपने नेत्रों के जल से पग धो डाले। सुदामा की प|ी ने भगवान कृष्ण को भेंट के रूप में दो मुठ्ठी चावल पोटली में बांधकर सुदामा को दिए थे कि अपने बाल सखा कृष्ण को भेंट के रूप में दे देना। सुदामा यह सोचकर चिंतित थे कि कृष्ण इतने बड़े राजा हैं उन्हें पोटली के चावल भेंट कैसे दूं। भगवान कृष्ण ने देखा कि मित्र कुछ छिपा रहा है। तभी उन्होंने सुदामा से पोटली ली और पोटली से चावल निकालकर खाने लगे और गरीब मित्र को अमीर बना दिया। अंत में श्रद्धालुओं को परीक्षित मोक्ष की कथा सुनाई। कथा के समापन पर हवन यज्ञ और महाआरती की गई है। इसके बाद प्रसादी वितरित कर कथा का समापन किया गया।

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