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महाभारतकालीन अाछोजाई की पहाड़ी, मंदिर में राजा जन्मेजय की चरण पादुका की होती है पूजा

3 वर्ष पहले
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भास्कर संवाददाता | रियांबड़ी/पादूकलां

नागौर जिले का इतिहास महाभारत कालीन भी रहा है। यहां की ऐतिहासिक धरोहरें, किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं। लेकिन सरकारों व प्रशासनिक उपेक्षाओं के चलते इन धरोहरों की दुर्दशा होती जा रही है। कुछ ऐसा ही हाल डेगाना के पास स्थित कोड्या डूंगरी के नाम से प्रसिद्ध अरावली पर्वतमाला की आछोजाई पहाड़ी के राजा जन्मेजय का जानाजी मंदिर व यहां स्थित तालाब की हो रही है। यहां मंदिर के गर्भ गृह में राजा जानाजी की चरण पादुका व मूर्ति की पूजा होती है। यहां महत्वपूर्ण पौराणिक स्थल होने के बावजूद भी यहां पहुंचने के लिए कोई सीधी सड़क नहीं है। न ही इस पूरे क्षेत्र में इस स्थल से जुड़ी जानकारी का कोई साइन बोर्ड लगा है। क्षेत्रवासी लंबे समय से सरकार से इस जगह को पर्यटन के रूप में विकसित करने की मांग करते आ रहे है।

राजा जन्मेजय ने छोड़ी थी चरण पादुका, श्रद्धालु अब यहां चप्पल चढ़ा मांगते हैं मन्नतें

रियां बड़ी. आछोजाई में राजा जन्मेजय का मंदिर।

हर रविवार व पूर्णिमा को भरता है मेला: प्रत्येक रविवार व पूर्णिमा को जानाजी मंदिर में भव्य मेला भरता है। इस दौरान यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते है। महंत जयराम गिरी महाराज ने बताया कि सुख सागर व महाभारतकालीन इस पहाड़ी पर कई प्रकार की दुर्लभ जड़ी बूटियां है। यहां का पहाड़ नर व नारी के रूप में भी जाना जाता है।

विधानसभा में रखा था मुद्दा गत वर्ष खींवसर विधायक हनुमान बेनीवाल ने सरकार से इस मंदिर के महाभारतकाल के वृतांत से संबंध के बारे में जानकारी मांगते हुए यहां से मिले शिलालेखों को सार्वजनिक किए जाने की मांग की थी। साथ ही पर्यटन विभाग द्वारा मंदिर का दौरा किए जाने के संबंध में तैयार रिपोर्ट को सदन के पटल पर रखने की मांग सरकार से की थी।

किवदंतियों के अनुसार महाभारतकाल में अभिमन्यु के पौत्र राजा जन्मेजय को कुष्ठ रोग हो गया था। कुष्ठ मुक्ति के लिए उन्हें अरावली पर्वतमाला के कोड्या डूंगरी में नहाने को कहा था। ऐसी मान्यता हैं कि यहां नहाने से कुष्ठ रोग दूर हो जाता हैं। इस दौरान जन्मेजय रेवंत डूंगरी पहुंच गए थे। जहां उनकी रेवती नामक घोड़ी ने दम तोड़ दिया था। डेगाना में स्थित इस पहाड़ी पर अाज भी रेवती घोड़ी की समाधि हैं। यहां से वे पैदल ही तामड़ोली गांव पहुंचे। जहां रात्रि विश्राम के बाद उन्होंने अपनी चरण पादुका छोड़ दी थी। यहां लोग आज भी मन्नत पूरी करने के लिए चप्पल चढ़ाया करते हैं। राजा जन्मेजय को लोकदेवता जानाजी के रूप में पूजा जाता है।

पर्यटन व पुरातत्व विभाग को भेजेंगे प्रस्ताव

इस क्षेत्र के पर्यटन, धार्मिक व ऐतिहासिक स्थलों की विस्तृत जानकारी जिला प्रशासन पर्यटन व पुरातत्व विभाग को भेज कर स्थलों को विकसित करने के प्रयास किए जाएंगे। नरेंद्र सिंह, सदस्य, जिला पर्यटन विकास समिति

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