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प्रदेश की पहली एसएचजी सेनेटरी नैपकिन इकाई बंद क्योंकि अफसर प्लांट चलाने बिजली नहीं दिलवा पाए

3 वर्ष पहले
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भास्कर संवाददाता | रियांबड़ी

महिला सशक्तिकरण के लिए नागौर जिले में करीब डेढ़ साल पहले शुरू की गई राज्य की पहली महिला स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) द्वारा कम लागत पर ‘सयानी’ सेनेटरी नैपकिन इकाई प्रशासनिक उदासीनता के चलते दम तोड़ चुकी है। पर्याप्त बिजली नहीं मिलने व कम उत्पादन के चलते हो रहे नुकसान के चलते अब ये इकाई बंद हो गई है। गौरतलब है कि करीब डेढ़ वर्ष पूर्व तत्कालीन कलेक्टर राजन विशाल के नवाचार प्रयासों के चलते रियां पंचायत समिति की मोड़ी कलां पंचायत में राज्य की पहली महिला स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) द्वारा कम लागत पर सैनेटरी नैपकिन की इकाई की शुरुआत की गई। जिसका उद्‌घाटन 13 अक्टूबर 2016 को मंत्री किरण माहेश्वरी ने किया था। लेकिन अब प्रशासनिक उदासीनता व यहां हर समय होने वाली बिजली कटौती के चलते पर्याप्त उत्पादन नहीं होने के चलते ये इकाई पूरी तरह बंद हो चुकी है। तत्कालीन कलेक्टर राजन विशाल ने यूपी के महोबा जिले के पंचायत उद्योग प्रबंधक को बुलाकर कम लागत में सैनेटरी नैपकिन के मॉडल की जानकारी ली थी और जिले के महिला अधिकारिता विभाग के अधिकारियों अन्य अधिकारियों को इससे रूबरू करवाया था। इसके बाद मोड़ी कलां गांव का ‘राम-सागर महिला स्वयं सहायता समूह’ यह इकाई लगाने के लिए आगे आया और 3 माह में ही इकाई लगा उत्पादन शुरू कर दिया था। तब तत्कालीन कलेक्टर राजन ने इस नैपकिन की ब्रांडिंग के लिए इसे ‘सयानी’ नाम दिया था।

थमा कारोबार : प्लांट में उत्पादन घटने से नहीं मिल पा रही थी पूरी लागत
रियां बड़ी. मोड़ी कलां में ‘सयानी’ सेनेटरी नैपकिन की इकाई में बंद पड़ी मशीनें।

अधिकारियों ने निगरानी भी नहीं की
इस दौरान जिला अधिकारियों से लेकर स्थानीय अधिकारियों तक की प्रशासनिक उदासीनता भी ‘सयानी’ सेनेटरी नैपकिन इकाई के बंद होने का बड़ा कारण बनी। जब तक यहां कलेक्टर राजन विशाल रहे, तब तक इस इकाई की महिला अधिकारिता विभाग के अधिकारियों द्वारा लगातार मॉनिटरिंग की जाती रही। लेकिन तत्कालीन कलेक्टर का तबादला हो जाने के बाद विभाग के अधिकारियों ने इसकी सुध नहीं ली।

उदासीनता
सुरक्षा मानकों का भी रखा पूरा ध्यान
बाजार में बिकने वाले दूसरे नैपकिन की तुलना में इसे भी 10 सदस्यीय स्वयं सहायता समूह द्वारा स्वास्थ्य की दृष्टि से पूरी तरह सुरक्षित रूप से तैयार किया जाता था। समूह की सदस्या हेमलता गौड़ ने बताया कि नैपकिन बनाने की पूरी प्रक्रिया साफ बंद कमरे में पूरे स्वास्थ्य सुरक्षा मानकों के अनुसार पूरी की जाती थी। वहीं पैकिंग से पहले तैयार नैपकिनों को स्टरलाइज किया जाता था। यहां तक कि पैकिंग में भी इको-फ्रेंडली बायो-डीग्रेडेबल प्लास्टिक ही काम में लिया जाता था। लेकिन इकाई में बिजली कटौती के कारण लगातार घटते उत्पादन के चलते स्वयं सहायता समूह की ओर से इस इकाई का संचालन करना भी मुश्किल हो रहा था।

प्रोजेक्ट की प्रदेशभर में हुई थी सराहना
तत्कालीन कलेक्टर राजन द्वारा शुरू किए गए इस नवाचार के बाद ग्रामीण क्षेत्रों की स्कूलों में पढ़ने वाली किशोरियों में मासिक धर्म के चलते होने वाली समस्याओं के समाधान के लिए चलाए गए ‘चुप्पी तोड़ो सयानी बनो’ अभियान के तहत स्कूलों में वितरित किए जाने वाले सेनेटरी नैपकिन के नवाचारों को प्रदेशभर में सराहना मिली थी। बाद में राज्य सरकार ने इस योजना के तहत सभी सरकारी स्कूलों में किशोरियों को निशुल्क सेनेटरी नैपकिन वितरण योजना को बजट घोषणा में शामिल किया था।

सराहना
मोड़ी कलां गांव के ‘राम-सागर महिला स्वयं सहायता समूह’ की मुख्य सदस्य हेमलता गौड़ ने बताया कि ये इकाई 10 सदस्यीय स्वयं सहायता समूह द्वारा स्वच्छता व गुणवत्ता के उच्च मापदंडों पर खरा रहकर संचालित की जा रही थी। शुरुआत में तो सब अच्छा चलता रहा। कुछ माह बाद ही यहां गांव में होने वाली बिजली कटौती के चलते उत्पादन में कमी आने लगी। जिसके चलते 10 महिलाओं को पूरे दिन यहां काम करने के बावजूद भी लागत निकाल पाना मुश्किल हो गया था। नतीजतन न चाहते हुए भी उन्हें इस इकाई को बंद करना पड़ा।

यूनिट को दूसरी जगह शिफ्ट करने की सोच रहे हैं
हां, वो इकाई बिजली कटौती व संचालन करने वाले महिला स्वयं सहायता समूह की रूचि कम हो जाने के चलते बंद हो गई है। अब हम उस इकाई को अन्यत्र शिफ्ट करने के बारे में भी सोच रहे हैं। अनुराधा सक्सेना, उप निदेशक, महिला अधिकारिता विभाग

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