चंबल के डाउन स्ट्रीम के 22 गांवों में शुद्ध पेयजल पहुंचाने के लिए 29 करोड़ की योजना का रुका काम अब तेजी से हो रहा है। पीएचई ने चंबल किनारे खाचरौद के फिल्टर प्लांट के समीप ही नया इंटकवेल व फिल्टर प्लांट निर्माण की शुरुआत भी कर दी है। 22 गांवों की लगभग 30 हजार की ग्रामीण आबादी के लिए यह खुशखबरी है, क्योंकि उद्योगों की स्थापना के बाद लगभग 60 से डाउन स्ट्रीम का भू-जल प्रदूषित होने से शुद्ध पेयजल की उपलब्धता अब नगण्य है। योजना से पीने के साफ पानी की समस्या का समाधान तो हो जाएगा, लेकिन स्थानीय उद्योगों में काम करने वाले लगभग 10 हजार श्रमिक जिन पर 50 हजार लोग आश्रित हैं, वे संकट में फंस जाएंगे। क्योंकि 22 गांवों को पानी चंबल पर बने चारों डेमों से ही लिया जाएगा। अगर योजना पूर्ण होने तक चंबल पर एक डेम और बन जाए तो संकट खड़ा नहीं होगा, अन्यथा गर्मी में पानी की कमी से उद्योग बंद करने की स्थिति बनना तय है।
पेयजल की व्यवस्था तो ठीक लेकिन रोजगार की
होगी दिक्कत, उद्योग बंद होने से पड़ेगा असर
22 गांवों को पेयजल मुहैया कराने की योजना बीते 11 सालों से लंबित है। वर्तमान विधायक दिलीपसिंह शेखावत काफी प्रयास के बाद योजना स्वीकृत कराने में सफल हुए, यह सराहनीय है। लेकिन योजना केवल ग्रेसिम के डेमों पर ही आश्रित नहीं होना चाहिए। क्या सिर्फ पानी लेने से जनता खुशहाल हो जाएगी। रोजगार की जुगाड़ कहां से होगी। जिन गांवों में पानी पहुंचने का रास्ता खुला है। वहां के ग्रामीण भी यहां के उद्योगों में काम करते हैं। शहर की शक्ल शहर जैसी ग्रेसिम के कारण है। ऐसे में उस पर संकट खड़ा करके योजना को मूर्तरूप देने की तैयारी भर कर लेने से गांवों को पानी मिल जाएगा। इस खुशफहमी को दूर कर पहले चंबल के डाउन स्ट्रीम में डेम बनाया जाएं। प्रोजेक्ट के लिए ग्रेसिम से भी मदद ली जाएं। शहर के लिए उद्योग जरूरी है। वर्तमान में चंबल पर बने चार डेमों से ही क्षेत्र के लगभग 800 एकड़ में सिंचाई संभव हो पाती है। इतने बड़े क्षेत्र में सिंचाई की व्यवस्था के लिए डेम बनाना पड़े तो लगभग 180 करोड़ रुपए शासन को खर्च करना पड़ेंगे, लेकिन यह जिम्मेदारी ग्रेसिम ने ले रखी है। नागदा-खाचरौद और रेलवे सहित लगभग डेढ़ लाख लोगों को रोजाना जलापूर्ति के साथ सिंचाई के लिए भी डेम से पानी मिलता है। ऐसे में इसी पर और 30 हजार लोगों को आश्रित करना सही नहीं है। इसके लिए एक अन्य डेम भी जरूरी है।
चार डेम में जमा होता 1023 एमसीएफटी पानी
चंबल पर फिलहाल 4 डेम बने हैं, जो ग्रेसिम ने बनाए हैं। ऐसे में अगर इन्हीं डेमों से 30 हजार अतिरिक्त लोगों के लिए जलापूर्ति की गई तो ग्रेसिम को हर साल दो से तीन माह के लिए बंद करना पड़ेगा। उत्पादन ठप होने का खामियाजा बेरोजगार होकर श्रमिक परिवार ही भुगतेंगे। साथ शासन को भी करोड़ों के राजस्व का नुकसान होना निश्चित है।
इन गांवों की 30 हजार की आबादी को मिलेगा पानी- परमारखेड़ी, भगतपुरी, किलोड़िया, गिंदवानिया, झिरमिरा, दिवेल,चंदोड़िया, तारोद, मोकड़ी, राजगढ़, बनवाड़ा, टूटियाखेड़ी, रजला, बेरछा, अलसी, कलसी, निपानिया, खजूरिया, भीमपुरा, गिदगढ़, निनावटखेड़ा, अटलावदा।
फायदा- 29 करोड़ का प्रोजेक्ट, लगभग 30 हजार की आबादी को होगा लाभ
नुकसान- चंबल पर बने पुराने डेमों से ही सप्लाई हुआ तो शहर में गहराएगा जलसंकट
समाधान- निनावटखेड़ा में प्रस्तावित 50 करोड़ का डेम जल्द बनाना होगा
एक करोड़ रोज राजस्व देता है उद्योग
अकेले ग्रेसिम उद्योग ही शासन को प्रतिदिन 1 करोड़ रुपए का टैक्स चुकाता है। शहर का व्यापार उद्योग पर निर्भर है। पानी की कमी से हर साल यह बंद होता है। उद्योग के साथ शासन भी नुकसान उठाता है। तालाबंदी से टैक्स के नुकसान का ही आंकलन शासन करें तो बीते 10 साल में 350 दिन उद्योग बंद रह चुका है। यानी की 350 करोड़ रुपए का नुकसान। इतनी राशि में चंबल पर 6 डेम और बनाए जा सकते थे।
जो सब सोच रहे हैं, उस पर हम काम कर रहे हैं - मामले में विधायक दिलीपसिंह शेखावत ने बताया प्रोजेक्ट पर स्वीकृति के पूर्व उन्होंने भी विधानसभा में यह सवाल किया था कि ग्रेसिम पर कितना भार डाला जाएगा। बगैर नया डेम बनाए 22 गांवों को पेयजल मुहैया कराया तो औद्योगिक क्षेत्र संकट में आएगा। आप भरोसा रखिए, हम नए उद्योग लाने की कोशिश में जुटे हैं, क्यों चाहेंगे कि पुराना बंद हो। इंतजार कीजिए, चंबल पर एक नहीं, डेमों की श्रृंखला बनाने के प्रयास में जुटा हुआ हूं। निनावटखेड़ा में 50 करोड़ से नया डेम प्रस्तावित है। योजना को उससे जोड़ा जाएगा। सर्वे का काम जल्द शुरू होगा। कचनारिया में एक हजार करोड़ की लागत से औद्योगिक क्षेत्र को विकसित करने की योजना भी इसी डेम पर निर्भर है। विकास की गति धीमी होती है। भरोसा रखिए सबकुछ अच्छा होगा।