कर्मचारी राज्य बीमा निगम के इंगोरिया रोड स्थित बीमा अस्पताल में 24 घंटे इमरजेंसी सुविधा मिलती है। एक्स-रे मशीन और पैथोलॉजी लैब चालू है। द्वितीय श्रेणी के 7 चिकित्सक उपचार करते हैं। यह दावा सामाजिक कार्यकर्ता जितेंद्र जायसवाल की शिकायत पर कर्मचारी राज्य बीमा निगम द्वारा अपने जवाब में दिया गया है, जबकि हकीकत यह है कि कमरों के ताले तक नहीं खुलते हैं। पंजीयन कक्ष से धूल तक साफ नहीं होती। वहीं रात में आपातकालीन व्यवस्था एक नर्स व भृत्य के भरोसे ही रहती है। जायसवाल द्वारा मय दस्तावेजों के पीएम कार्यालय में दोबारा शिकायत कर रोग विशेषज्ञों, महिला चिकित्सक की नियुक्ति को लेकर पत्र लिखा है। जिस पर पीएम कार्यालय ने मप्र शासन को कार्रवाई के लिए पत्र भी जारी कर दिया है।
15 हजार से ज्यादा श्रमिक
जायसवाल के मुताबिक शहर में लघु व बड़े लगभग 10 उद्योग संचालित होते हैं। इसके अलावा 500 ईंट भट्टे भी संचालित होते हैं। इन्हें मिलाकर 15 हजार से अधिक श्रमिक हैं। स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने के लिए इन श्रमिकों के वेतन से प्रतिमाह 1.75 प्रतिशत की राशि बीमा फंड के नाम पर काटी जाती है। ताकि इमरजेंसी में श्रमिक व परिवार को स्वास्थ्य सुविधा मिल सके, लेकिन बीमा निगम के दो औषधालय व एक अस्पताल होने के बाद भी चिकित्सकों के उपस्थित नहीं होने से श्रमिक व परिजनों को लाभ ही नहीं मिल पाता।
1999 में हुई थी अस्पताल की शुरुआत : इंगोरिया रोड स्थित बीमा अस्पताल 6 बीघा में बना हुआ है। इसका लोकार्पण 6 जून 1999 को हुआ था। 3 साल तक अस्पताल में सभी रोगों का उपचार, जांच होती थी, लेकिन धीरे-धीरे सुविधा बंद होने लगी। अब हालात यह है कि गर्भवती महिलाओं की जांच, शुगर, रक्त, एक्स-रे तक की सुविधा अस्पताल में नहीं है। ऐसे में अस्पताल मात्र सफेद हाथी साबित हो रहा है और मरीजों को परेशान होकर स्वयं के खर्च से निजी अस्पतालों में उपचार कराना पड़ रहा है।
अस्पताल में जहां मरीजों का पंजीयन होता है, उस स्थान पर धूल ही धूल नजर आ रही है।
130 किमी का तय करना होता है सफर
जायसवाल ने बताया कि कर्मचारी राज्य बीमा निगम ने यह माना है कि 5 रोग विशेषज्ञ, 1 महिला चिकित्सक व 7 द्वितीय श्रेणी चिकित्सक के पद रिक्त है। इसके अतिरिक्त जो व्यवस्था है उसके भी हाल बेहाल है। इस वजह से गंभीर बीमारी से पीड़ित मरीज व गर्भवती महिलाओं को उपचार के लिए निजी अस्पतालों का ही सहारा लेना पड़ता है या फिर इंदौर 130 किमी दूर स्थित अस्पताल जाना होता है। ऐसे में कई बार मरीजों की मौत भी हो जाती है। वहीं निजी अस्पताल में उपचार के बाद बिल भुगतान में भी बीमा निगम द्वारा आनाकानी की जाती है।