सालों से नेता ये मानते आए हैं कि वोटर्स सिर्फ चुनावों में वोट देते हैं। अब कर्नाटक चुनावों के बाद ये तय हो गया है कि वोटर्स सिर्फ वोट नहीं देते, ऐसा उलझाऊ सा जनादेश देकर मजे भी लेते हैं। ये वोटर की ताकत ही है कि सबसे ज्यादा सीटें पाने वाली पार्टी सबसे ज्यादा सकते में है। कम सीटें पाने वाली पार्टी सरकार बनाने की बात कर रही थी और सबसे कम सीटें पाने वाली पार्टी सबसे ज्यादा मजबूत नज़र आ रही थी। ऐसा ही चलता रहा तो किसी दिन जमानत जब्त उम्मीदवार सरकार भी बना लें तो आश्चर्य नहीं होगा।
खैर ऐसे चुनावों के बाद नेताओं की सांस भी हलक में अटक जाती है। वजह ये नहीं होती कि राजनीति जमकर हो रही होती है। डर की वजह गणित है, इतने हिसाब-किताब, जोड़-गणित, आंकलन-समाकलन, प्रलोभन आते हैं कि कमजोर गणित वाला आदमी तो नेता ही न बन पाए। आम तौर पर माना जाता है कि जो छात्र पढ़ाई में अच्छे नहीं होते वो छात्रनेता बन जाते हैं, लेकिन इकाई-दहाई-करोड़, दो तिहाई- विधायक छुपाई, बचा-बटा, जोड़-तोड़ और हिसाब-किताब का ऐसा मायाजाल रच दिया गया है कि अब तो एमएलए बनने की योग्यता भी गणित में मास्टर्स की डिग्री होनी चाहिए। आने वाले दिनों में पार्टी अध्यक्ष टिकट देने के पहले 17 का पहाड़ा और भाग विधि से घनमूल निकालने का तरीका पूछते दिख सकते हैं। मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार भी वही आदमी बन सकेगा जो राजनीति से ज्यादा त्रिकोणमिति का ज्ञान रखेगा, इस तरह से राजनीति में शिक्षित लोगों को लाने का सपना भी पूरा हो जाएगा।
तब बजाय ये कहने कि फलाने 5 बार विश्वेश्वरैया नहीं बोल सकेंगे, ये कहा जाएगा कि फलाने 15 मिनट में बीजीय व्यंजक और सर्वसमिकाओं के 5 सवाल हल नहीं कर पाएंगे। अभी भले विवाद कैम्ब्रिज एनालिटिका के जरिए वोटरों को लुभाने पर होता हो, तब खुलासे कुछ यूं होंगे कि फलाने पार्टी ने लोकसभा चुनाव के पहले अपने अध्यक्ष को \\\"अजय मैथ्स एंड इंग्लिश क्लासेज\\\' पढ़ने भेजा था। फिलहाल विवाद सड़कों के नाम बदलने पर होते हैं, तब विवाद कुछ यूं होंगे कि एक पार्टी सत्ता में आते ही सारे देश में देवनागरी अंक चलवाना चाहेगी और दूसरी पार्टी अन्तरराष्ट्रीय अंकों पर अड़ जाएगी।
मुझे तो उस दिन का इंतज़ार है जब राजनीति में गणित इस कदर घुस जाए कि लाइव टीवी डिबेट में दो प्रवक्ता इस बात पर भिड़ जाएं कि द्विघात समीकरण का पूर्ण वर्ग बनाकर हल करना किसकी पार्टी ने पहले सीखा था। त्रिभुजों की समरूपता के सवाल पर विधानसभाएं भंग होने लगें। और किसी दिन किसी मुख्यमंत्री की कुर्सी सिर्फ इस बात पर चली जाए जब वो ये न बता पाएं कि एक उम्मीदवार ने अगर 8 लाख में एक टिकट खरीदा और विधायक बनने के बाद 45 लाख में अपना समर्थन किसी पार्टी को बेच दिया तो उसे कुल कितने प्रतिशत लाभ या हानि हुई?