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चुनावी साल में कीमतों के मुद्दे से बचने के लिए सरकार खरीदेगी 26 करोड़ किलो प्याज

3 वर्ष पहले
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चुनावी साल में प्याज की कीमतों को कहीं विपक्ष मुद्दा नहीं बना ले इसलिए सरकार किसानों से 26 करोड़ किलो प्याज खरीदेगी ताकि बाजार में जब भी प्याज के दाम बढ़ने लगे सरकार अपना प्याज रिलीज कर इसकी कीमतों को काबू कर सके। प्याज की कीमतें देश में कई बार सरकारों का तख्ता पलट कर चुकी है। प्रदेश में इस साल विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में प्याज को लेकर जनता के मिजाज को ठंडा रखने के लिए सरकार किसानों से 2 लाख 60 हजार मेट्रिक टन प्याज खरीदने जा रही है। इसके लिए किसानों को 6.18 रुपए प्रति किलो की दर से भुगतान किया जाएगा। प्याज के साथ 1.54 लाख मेट्रिक टन लहसुन की भी खरीद की जाएगी। इसके लिए किसान को 32.57 रुपए प्रतिकिलो की दर से भुगतान किया जाएगा। यह खरीद 13 अप्रेल से 12 मई तक राजफैड के जरिए की जाएगी।

पिछले साल प्याज ने किया था परेशान
पिछले साल प्याज की कीमतों में काफी उठा पटक मची थी। साल की शुरुआत में किसान को प्याज की लागत का पैसा भी नहीं मिल पाया लेकिन बाद में स्टॉकिस्टों ने इसकी कीमतों को आसमान पर पहुंचा दिया। करीब पांच महीनों तक प्याज 45 से 60 रुपए किलो तक बिका। इस साल प्याज की कीमतें बढ़ती हैं तो इसका सीधा असर चुनावों पर होगा। इसलिए सरकार पहले से ही इसकी तैयारियां करके चल रही है। हालांकि पिछले साल भी सरकार ने प्याज और लहसुन की खरीद के लिए मार्केट इंटरवेंशन स्कीम लागू की थी। इसमें लहसुन के लिए 32 रुपए और प्याज के लिए 4 रुपए किलो का भाव तय किया गया। इस भाव पर किसानों ने 105 मेट्रिक टन लहसुन सरकार को बेचा लेकिन प्याज बेचने के लिए कोई किसान नहीं आया क्योंकि बाजार में किसानों को इससे कहीं ज्यादा भाव मिल रहा था।

प्याज ने पहले भी गिराई हैं सरकारें
प्याज की कीमतों ने पहले भी कई बार तख्त पलटे हैं। चाहे आपातकाल के बाद आई जनतापार्टी की सरकार हो या इसके बाद 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार। संसद से लेकर विधानसभाओं में कई बार नेता प्याज की बढ़ी हुई कीमतों के विरोध में प्याज की माला पहनकर भी पहुंचे। आपातकाल के बुरे दौर के बाद जब देश में जनता पार्टी की सरकार बनी थी। सत्ता से बेदखल हो चुकी इंदिरा गांधी के पास कोई बड़ा मुद्दा नहीं था। अचानक ही प्याज की कीमतें बढ़ने लगीं तो उन्हें एक मुद्दा मिल गया। कहा जाता है कि जनता पार्टी की सरकार भले ही अपनी वजहों से गिरी हो, लेकिन कांग्रेस ने उसके बाद का चुनाव प्याज की वजह से जीत लिया। केंद्र में जब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी तो 1998 में प्याज की कीमतों ने फिर रुलाना शुरू कर दिया और भाजपा चुनाव हारी। इसके बाद दिल्ली में मुख्यमंत्री शीला दीक्षित की सरकार के समय भी प्याज की कीमतें आसमान छू गईं। सरकार ने कीमतें काबू करने के लिए दुकान लगाकर काबू करने की कोशिश की।

प्रदेश में इस साल पिछले साल से पौने दो लाख मेट्रिक टन ज्यादा हुई है फसल : इस साल प्रदेश में प्याज की बंपर पैदावार हुई है। किसान प्याज मंडी में ला रहा है। करीब 63 हजार हैक्टेयर में प्याज की बुआई हुई थी जिससे 13 लाख 19 हजार मेट्रिक फसल बाजार में आने की उम्मीद है। यानी पिछले साल से करीब पौने दो लाख मेट्रिक टन ज्यादा फसल इस बार हुई है। फिलहाल बाजार में देसी प्याज के लिए किसान को 6 से 7 रुपए किलो और नाकिस के प्याज के 9 से 12 रुपए किलो के भाव मिल रहे हैं। प्रदेश में मई के बाद प्याज की कीमतें बढ़ने लगती हैं क्योंकि तब तक स्थानीय आवक लगभग खत्म हो जाती है और ज्यादातर आपूर्ति नासिक से होती है। प्याज कारोबारियों का कहना है कि अभी से सरकार किसानों से प्याज खरीद लेती है तो आने वाले महीनों में भी इसकी कीमतों में ज्यादा अंतर नहीं आएगा।

इन जिलों में होगी खरीद : प्रदेश में जोधपुर, नागौर, सीकर, झुंझुनू, जयपुर और बीकानेर में राजफैड के जरिए प्याज की खरीद की जाएगी। वहीं कोटा, झालावाड़, बूंदी, बारां और प्रतापगढ़ में लहसुन खरीद केंद्र लगाए जाएंगे।

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