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एमपी-उड़ीसा के मौजूदा कानून जैसा बिल बनाया, फिर हमारा कानून क्यों अटका रखा है?

3 वर्ष पहले
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प्रदेश में कोर्ट के आदेश से धर्मांतरण के मामलों में डीएम या एसडीएम की अनुमति से ही निकाह या शादी

पॉलिटिकल रिपोर्टर |जयपुर

राज्य सरकार ने जबरन धर्म परिवर्तन के मामलों को रोकने संबंधी नौ साल पुराना बिल राष्ट्रपति से जल्द से जल्द मंजूर कराने के लिए केंद्र सरकार को पत्र लिखा है। इसमें कहा गया है कि राजस्थान हाईकोर्ट के एक आदेश के बाद प्रदेश में धर्मांतरण संबंधी प्रकरणों में निकाह या शादी से पहले कलेक्टर या एसडीएम की मंजूरी अनिवार्य कर दी है। गृह मंत्री गुलाब चंद कटारिया ने केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह को लिखा है कि हाईकोर्ट के निर्देश पर प्रदेश में बिल के प्रावधानों को गाइडलाइन के जरिए लागू कर दिया गया है। इसलिए, राष्ट्रपति से मंजूरी दिलाने का अनुरोध किया है। कटारिया ने लिखा है कि उड़ीसा व एमपी में लागू कानून के अनुरूप राज्य सरकार ने बिल बनाया, फिर भी इसे मंजूरी नहीं दी जा रही है ।

अटार्नी जनरल की आपत्तियों को दूर किया

गृह मंत्री लिखा है कि राज्य सरकार ने राजस्थान धर्म स्वातंत्र्य बिल-2008 विधानसभा में पारित करवाकर केंद्र सरकार को राष्ट्रपति की सहमति दिलाने के लिए भेजा था। अटार्नी जनरल ने इस बिल को लेकर कई सवाल उठाए थे। राज्य सरकार ने उन मुद्दों को बिल से हटा दिया है। गत साल दो जून को संशोधन के बिल भेज दिया गया है।

उड़ीसा-एमपी जैसा ही कानून, फिर मंजूरी क्यों नहीं

गृह मंत्री कटारिया ने कहा कि उड़ीसा व मध्य प्रदेश में लागू कानून के अनुरूप ही राज्य सरकार ने बिल तैयार किया था। यह कानून दोनों राज्यों में लागू है। अटार्नी जनरल की ओर से उठाई गई आपत्तियों तक को दूर कर दिया गया। फिर भी कानून को मंजूरी नहीं दी जा रही है।

कलेक्टर-एसडीएम की अनुमति निकाह या शादी
कटारिया ने लिखा है कि बिल केंद्र सरकार के पास है। इस बीच डीबी हैबियस कार्पस चिराग सिंघवी बनाम राज्य सरकार में हाईकोर्ट जोधपुर ने 15 दिसंबर को निर्णय पारित किया है। इसमें धर्म स्वातंत्र्य बिल की मंजूरी तक जबरन धर्मांतरण रोकने के लिए आवश्यक दिशा-निर्देश जारी किए थे। इसमें निकाह या शादी की सूचना डीएम या एसडीएम को देने के निर्देश दिए गए हैं। ताकि, जबरन धर्मांतरण के मामलों पर अंकुश लगाया जा सके। बिल में भी इसी तरह के प्रावधान किए गए हैं।

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