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नगर परिषद की जमीनों पर हो रहे अवैध कब्जों के बारे में पूछा तो अधिकारी का जवाब- पूछने वाले की जमीन पर नहीं है कब्जा

3 वर्ष पहले
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नगर परिषद को उसकी मलकियत का रिकॉर्ड उपलब्ध करवाने के बाद जब परिषद ने कोई कार्रवाई नहीं की तो मामले की शिकायत सीएम विंडो में की गई। 15 जून को सीएम विंडो की ओर से शिकायत नंबर 0121939 के तहत जवाब मांगा गया तो नगर परिषद अधिकारियों का जवाबी तरीका भी शानदार रहा। शिकायत पर कार्रवाई करते हुए नोडल आॅफिसर म्यूनिसिपल इंजीनियर ने अपनी ओर से लिखा कि शिकायतकर्ता द्वारा नगर परिषद की प्रत्येक भूमि की पैमाइश करवाकर उस पर तारबंदी के लिए लिखा गया है, उसमें शिकायतकर्ता का अपना कोई खसरा नंबर नहीं है। अत: आपसे अनुरोध किया जाता है कि उक्त शिकायत को दाखिल दफ्तर किया जाए।

परिषद के अधिकारियों के इस जवाब से साफ तौर पर उनके कामकाज के तरीके का पता चलता है। यानी अगर कोई सरकारी भूमि पर होने वाले अवैध कब्जे की जानकारी देते हुए उसे बचाने के लिए सरकार से अपील करे तो नगर परिषद प्रशासन के लिए वह जमीन बचाने वाली बात कोई महत्व नहीं रखती। उसके लिए तो महत्वपूर्ण बात यह है कि शिकायतकर्ता अगर पीड़ित है तो उसका समाधान कर सकते हैं, अपनी मलकियत को बचाने की फिक्र दूसरे को नहीं करनी चाहिए। दिलचस्प यह रहा कि इसी शिकायत पर नगर परिषद के एक और रिपोर्टकर्ता अधिकारी ने जवाब दिया कि सेवानिवृत्त नायब तहसीलदार नेतराम वर्मा को परिषद की भूमि की पैमाइश के लिए लोकल कमिश्नर करवाकर उनसे पैमाइश करवाई जा रही है। नगर परिषद के जेई का यह जवाब अब से एक महीने पहले दिया गया है। जबकि इसी 3 अगस्त को हुई नगर परिषद की आमसभा की बैठक में ईओ अभयसिंह ने स्वीकार किया कि परिषद की जमीन की पहचान का काम अभी नहीं हो पाया है। इस बैठक में ही ऐसी जमीनों की निशानदेही करवाने के लिए राजस्व विभाग व पुलिस के सहयोग से टास्क फोर्स बनाने के प्रस्ताव को पार्षदों ने अपनी मंजूरी दी थी।

सीएम विंडो पर की जाने वाली शिकायत को कितनी गंभीरता से लिया जाता है, उसका तीसरा उदाहरण इसी शिकायत पर दिए जाने वाले जवाब से पता चल जाता है। प्रख्यात नागरिक के रूप में यहां सरकार की ओर से बनाई गई निगरानी समिति के सदस्य सुरेश चौधरी ने अपनी टिप्पणी में लिखा है कि इस बाबत नगर परिषद ने तहसीलदार को लिख दिया है। जल्दी ही पैमाइश करा लेनी चाहिए। मतलब सारा सिस्टम ही लीपापोती की राह पर अमल करते हुए अपनी खाल बचा रहा है।

क्यों हो रहा है ऐसे : जानकारी के अनुसार नगर परिषद का अपने स्वामित्व वाले भूखंड़ों की जानकारी न होने का एक कारण यह भी बताया जाता है कि वर्ष 1984 के बाद से ना शहर का मसावी बना, यानि खसरा टाउन नक्शा उपलब्ध नहीं है और ना ही कोई चकबंदी हुई है। यही कारण 1989-90 में रेवेन्यू जमाबंदी के हिसाब से ही नगर परिषद शहर के कुछ हिस्सों में मौजूद भूमि को ही अपनी मलकियत माने हुए है। जबकि भूमाफिया धीरे-धीरे उसकी बेशकीमती जमीन को कब्जाते जा रहे हैं। पिछले सप्ताह ही विधायक के निवास के सामने नप की ऐसी ही जमीन पर पक्के निर्माण का मामला सुर्खियों में रहा था। अब परिषद अधिकारी जल्दी ही अपनी जमीन की पैमाइश करवाकर उस पर तारबंदी किए जाने की कार्रवाई शुरू करने का दावा कर रहे हैं।

आखिर क्या है पूरा मामला

बता दें कि जिला कष्ट निवारण समिति के सदस्य व वरिष्ठ भाजपा नेता पृथ्वीसिंह एडवोकेट व राजेंद्र यादव ने कई बार ग्रीवांस मीटिंग में मुद्दा उठाया, किंतु जब कोई सुनवाई नहीं हुई तो राजेंद्र यादव ने अपने स्तर पर कमेटी का रिकाॅर्ड खंगालकर एक रिपोर्ट तैयार की। उनकी रिपोर्ट के अनुसार नप मलकियत वाली शहर में 200 बीघा 1 बिसवा जमीन मौजूद है। इसके अलावा 369 बीघा 12 बिसवा जमीन रघुनाथपुरा की पहाड़ी क्षेत्र में भी मौजूद है। शहर में नप की मलकियत वाली जमीन में रामानंद राधेश्याम धर्मशाला के पास, महत्ता चौक, निर्मल डाक्टर के पीछे, रेवाड़ी रोड पर बस स्टैंड के उत्तर दिशा में, यादव धर्मशाला के उत्तर दिशा में, छलक नदी का पूरा क्षेत्र, धोबी जोहड़ की 40 बीघा, बहरोड़ रोड, लाल पहाड़ी की 40 बीघा, सामेश्वर तालाब, स्टेडियम के पास की जमीन शामिल है। इसके अलावा रघुनाथपुरा पहाड़ी के पास खसरा नंबर-207, 209, 211, 214, 216, 385, 386 और 387 के तहत 369 बीघा 12 बिसवा जमीन भी नगर परिषद की बनती है। इस तरह 569 बीघा से ज्यादा भूमि वाली यह नगर परिषद अरबों रुपए की मालकिन है, किंतु विडंबना है कि इसके अधिकारी अपनी जमीन को बचाने में रुचि नहीं रखते। राजेंद्र यादव के अनुसार 6 महीने पहले उन्होंने डीसी, स्थानीय निकाय हरियाणा के डायरेक्टर व मुख्यमंत्री को यह रिकाॅर्ड उपलब्ध करवाया। सीएम विंडो में शिकायत दी गई तो वहां भी लीपापोती का ही प्रयास किया गया है।

शहर का नए सिरे से सजरा प्लान नक्शा बनाएंगे : ईओ नगर परिषद

नगर परिषद की भूमि का पूरा रिकाॅर्ड उपलब्ध नहीं है। हम सजरा टाउन नक्शा और 1989-90 की रेवेन्यू जमाबंदी के हिसाब से ही काम चला रहे हैं। अब शहर का नए सिरे से सजरा प्लान नक्शा बनाना है। नगर परिषद की जमीनों की पैमाइश करवाने के लिए भी प्रशासन से मदद लेने की तैयारी चल रही है। जहां तक सीएम विंडो पर जवाब देने का मामला है तो यह मेरे संज्ञान में नहीं है। ऐसा क्यों हुआ, इस संबंध में संबंधित रिपोर्ट देखकर ही कुछ बता पाना संभव होगा। -अभयसिंह यादव, ईओ नगर परिषद नारनौल।

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