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ठेके पर चलाए जा रहे स्कूल वाहन 50 रुपए मासिक किराया भी बढ़ा

3 वर्ष पहले
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भास्कर संवाददाता| नसरुल्लागंज

स्कूल बसों के संचालन में की जा रही गड़बड़ी के कारण प्रतिदिन बच्चे खतरे के बीच स्कूल आना-जाना कर रहे हैं। अभिभावकों ने बच्चों के लिए ऑटो और स्कूल बसें मासिक शुल्क पर लगा रखी है। इन वाहनों में निर्धारित मापदंडों का पालन नहीं किया जा रहा। स्कूल वाहनों से कई बार दुर्घटनाएं भी हो चुकी हैं। इन दुर्घटनाओं में कोई बड़ा नुकसान नहीं हुआ है।

नगर के एक निजी स्कूल में स्कूल बस का संचालन प्राइवेट ठेका पद्धति पर कर रखा है। इससे अभिभावकों को बस मालिक को ही किराया देना पड़ रहा है। इसी बीच एक बड़ा सवाल अभिभावकों ने यह खड़ा किया है कि यदि स्कूल जाते समय यदि कोई हादसा होता है तो इसकी जवाबदारी अभिभावक की होगी न कि स्कूल प्रबंधन की।अधिवक्ता व अभिभावक महेंद्र सिंह सोलंकी और शरद व्यास का कहना है कि इस साल से स्कूल बस संचालक ने बस के किराए में 50 रुपए की बढ़ोतरी की गई है। वह इसका फार्म भी हमसे भरवा रहे हैं।

वाहनों में क्षमता से ज्यादा संख्या में बैठाए जा रहे बच्चे, अन्य सुविधाएं भी नहीं
पुरानी बसों का किया जा रहा स्कूलों में उपयोग, हो सकता है हादसा।

नगर में स्कूल वाहनों की यह है स्थिति
30 स्कूल बसे नसरुल्लागंज में

25 मैजिक ऑटो वाहन चल रहे हैं,

2500 बच्चे प्रतिदिन इन बसों व मैजिक वाहनों से स्कूल पहुंच रहे हैं।

यह हो चुकी है दुर्घटनाएं
क्षेत्र के गांव बोरखेड़ा में स्कूल बस चालक की लापरवाही से बस अनियंत्रित होकर खेत में घुस गई थी। इससे कई बच्चों को चोट आईं थीं। इसी प्रकार राला में एक स्कूल बस वाहन से टकराने के बाद पलट गई थी। नीलकंठ रोड, इंदौर रोड सहित नगर की पाश कालोनियों में कई बार स्कूल बसें चालकों की लापरवाही से टकरा चुकी हैं। जिनमें बच्चों को जानमाल की हानि नहीं हुई।

कार्रवाई की जाएगी
शीघ्र ही प्रशासन स्कूल संचालकों के साथ बैठक कर बच्चों की सुरक्षा को लेकर ठोस कदम उठाएंगे । पुलिस के निर्देश के बाद भी बसों में सुरक्षा मानकों की पूर्ति न करने वाले मालिक व स्कूल प्रबंधन के विरुद्ध कार्रवाई की जाएगी। अनिल त्रिपाठी, एसडीओपी

मापदंडों की उड़ रही धज्जियां
स्कूल के मैजिक वाहनों में क्षमता से अधिक बैठाए जा रहे हैं बच्चे

मैजिक वाहनों में स्कूली बच्चे बाहर पैर लटका कर स्कूलों तक सफर करते हैं।

स्कूल बसों में सीसीटीवी कैमरे आज तक नहीं लगाए गए।

जीपीएस सिस्टम की आवश्यकता महसूस नहीं की जा रही।

महिला अटेंडर नहीं रहती है, तेज गति से स्कूल वाहन दौड़ाए जाते हैं।

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