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झुंझारपुरा: लोग 192 साल से कर रहे तालाब में श्रमदान, इसलिए नहीं झेला कभी सूखा

3 वर्ष पहले
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यह है झुंझारपुरा गांव का सबसे पुराना हिमोलाई तालाब। आज यहां गांव के हर रास्ते से भीड़ तालाब की ओर से जाती नजर आई। वजह भी खास थी, क्योंकि ग्रामीण यहां की 192 साल पुरानी परंपरा को जीवित रखने और समाज में जल संरक्षण का संदेश देने की पहल के लिए गांव के तालाब पर श्रमदान के लिए पहुंच रहे थे। भादवा गांव के राजस्व ग्राम झुंझारपुरा गांव में मंगलवार के दिन ग्रामीणों ने ज्येष्ठ माह की तपती गर्मी के बीच अपनी बरसों पुरानी परंपरा को निभाते हुए हर घर से ग्रामीणों ने तालाब पर पहुंचकर सामूहिक रूप से तालाब पहुंचकर खुदाई की व श्रमदान किया। गांव के आंचरा परिवार की पर्यावरण व जल संरक्षण की इस मुहिम को जीवित रखने के लिए युवा वर्ग बड़ी संख्या में हर बार की तरह इस कार्यक्रम में सक्रिय भागीदार रहा। वहीं आस-पास के गांवों के ग्रामीणों ने भी श्रमदान में सहयोग किया।

झुंझारपुरा सेवा समिति के अध्यक्ष ईश्वर राम आंचरा ने बताया कि 192 वर्ष पूर्व समाज के हेमाराम आंचरा ने आज के दिन ही ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या के दिन तालाब खुदवाकर श्रमदान की परंपरा शुरू की थी। तब से अब तक हर वर्ष तालाब के स्थापना दिवस पर श्रमदान होता है। ग्रामीणों की ऐसी मान्यता है कि झुंझार बाबा की कृपा से इस तालाब में कभी पानी पूरा नहीं होता। बुजुर्ग ग्रामीण बताते है कि इस तालाब को उन्होंने कभी सूखा नहीं देखा। उन्होंने बताया कि वर्तमान में गांव के प्रकृति प्रेमियों के प्रयासों से तालाब आज जल व पर्यावरण संरक्षण का मॉडल बन चुका है।

सेवा : ग्रामीणों के लिए महाप्रसादी भी रखी

मंगलवार को तालाब में श्रमदान करने के लिए सेवा समिति ने पुख्ता इंतजाम किए गए। तेज धूप में ग्रामीणों को गर्मी से बचाने के लिए पेय पदार्थ भी तैयार किया गया। साथ ही महाप्रसादी का आयोजन बड़े स्तर पर किया गया। जिसमें बड़ी संख्या में ग्रामीण शामिल हुए। युवाओं ने कहा कि वह गांव की इस बेमिसाल व समृद्ध परंपरा को जीवित रखने का हरसंभव प्रयास करेंगे।

ज्येष्ठ माह की अमावस्या पर हिमोलाई तालाब के स्थापना दिवस के दिन झुंझारपुरा के प्रत्येक घर से सदस्य पहुंचते है श्रमदान के लिए

हरनावां. झुंझारपुरा गांव के हिमोलाई तालाब में 192 साल पुरानी परंपरा के तहत श्रमदान करने पहुंचे ग्रामीण।

सख्ती :

कोई गांव से पेड़ नहीं काट सकता

झुंझारपुरा के युवा कैलाश आंचरा ने बताया कि हिमोलाई तालाब का क्षेत्रफल 93 बीघा में है। इसके क्षेत्र से कोई हरा पेड़ एवं सूखे पेड़ों की टहनियां तक नहीं ले जा सकता। वहीं यहां का हर व्यक्ति पर्यावरण संरक्षण के लिए स्थापना दिवस पर पौधरोपण कर उनके संरक्षण का संकल्प लेता है।

संदेश | दृढ़ इच्छाशक्ति हो तो बचा सकते है पानी

ग्रामीणों ेक अनुसार करीब 192 वर्ष पूर्व जब इस परंपरा की शुरुआत की गई तो उस समय कई चुनौतियां भी आई होंगी। लेकिन ग्रामीणों की दृढ़ इच्छाशक्ति और संकल्प के कारण आज तालाब मॉडल के रूप में विकसित है। इसके साथ ही वर्तमान पीढ़ी भी अपने गांव की इस परंपरा को कायम रखने के लिए अपनी ओर से जी-जान से जुटी हुई है। वे बताते हैं कि अपने स्तर पर प्रयास कर हम वर्षा जल का संग्रहण कर काफी हद तक पानी को बचा सकते है और भू-जल स्तर को भी काफी हद तक बढ़ाने में अपना योगदान दे सकते हैं।

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