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कर्नाटक ढाई दिन में पतन

3 वर्ष पहले
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कर्नाटक में 55 घंटे के मुख्यमंत्री येद्दियुरप्पा ने शनिवार शाम शक्ति परीक्षण से पहले ही इस्तीफा दे दिया। अब कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन सरकार बनाएगा। कुमारस्वामी बुधवार को शपथ लेंगे। पहले सोमवार का दिन तय हुआ था। पर पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की पुण्यतिथि के कारण इसे दो दिन आगे बढ़ाया गया। राज्यपाल ने कुमारस्वामी को भी बहुमत साबित करने के लिए 15 दिन दिए हैं। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने येद्दि को दी 15 दिन की मोहलत घटाकर एक दिन कर दी थी। कोर्ट ने शनिवार सुबह फ्लोर टेस्ट के सीधे प्रसारण का भी आदेश दे दिया। इसके बाद 4 घंटे में घटनाक्रम तेजी से बदला। 101% जीत का दावा करने वाली भाजपा बैकफुट पर आ गई। कांग्रेस ने 4 टेप जारी कर भाजपा पर विधायक खरीदने के आरोप लगाए। कांग्रेस के 3 लापता विधायक भी लौट आए। डेढ़ बजे तक भाजपा को हार का अाभास हो गया। इसके बाद भावुक भाषण के साथ येद्दि के इस्तीफे की पटकथा तैयार की गई।

राज्यपाल ने कुमारस्वामी को भी 15 दिन का ही समय दिया

मोदीक्रेसी फेल, डेमोक्रेसी पास

क्योंकि भाजपा ने बहुमत न होने पर भी सरकार बनाई। फ्लोर टेस्ट के लिए 15 दिन भी ले लिए। कोर्ट ने एक दिन का वक्त दिया तो विधायक नहीं जुटा पाए। सरकार गई। 4 साल के मोदी राज में ऐसा पहली बार हुआ।

फ्लोर टेस्ट से पहले विधायक खरीदने के 4 टेप सामने आए

कर्नाटक टीम चाहती थी कि कांग्रेस-जेडीएस सरकार बनाएं; दिल्ली के अड़ने पर बनी थी येद्दि की सरकार

भास्कर न्यूज | नई दिल्ली

भाजपा के रणनीतिकार अल्पमत सरकार के पक्ष में नहीं थे। लेकिन दिल्ली में शीर्ष नेतृत्व के अड़ने पर येद्दियुरप्पा ने शपथ ली। सूत्रों के मुताबिक चुनाव में अहम भूमिका में रहे राज्यसभा सदस्य राजीव चंद्रशेखर का मत था कि बहुमत का जुगाड़ जल्दी संभव नहीं है। पहले कांग्रेस-जेडीएस को सरकार बनाने दें। फ्लोर टेस्ट के लिए राज्यपाल उन्हें 10-15 दिन देंगे। उस दौरान विधायक तोड़कर कांग्रेस-जेडीएस सरकार गिरा सकते हैं। नहीं तो 5-6 माह में गठबंधन सरकार में विवाद जरूर होंगे। ऐसे में लोकसभा चुनाव के करीब कुमारस्वामी की सरकार गिरा सकते हैं। लेकिन शीर्ष नेतृत्व सरकार बनाना चाहता था। विधायक जुटाने का काम येद्दि के विरोधी सोमशेखर रेड्‌डी को सौंपा। लेकिन विपक्ष की घेराबंदी और सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने सारी रणनीति पर पानी फेर दिया। और तो और तुमकुर मठ के धर्मगुरु शिवकुमार स्वामी भी लिंगायत विधायकों से संपर्क नहीं कर पाए थे।

55 घंटे के सीएम येद्दि का फ्लोर टेस्ट से पहले इस्तीफा; कांग्रेस+जेडीएस के कुमारस्वामी बुधवार को शपथ लेंगे

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तब देवेगौड़ा पीएम बने थे, अब उनके पुत्र सीएम बनेंगे

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तब भाजपा के वाजपेयी ने इस्तीफा दिया था और जनता दल के देवेगौड़ा पीएम बने थे: 1996 में वाजपेयी को 13 दिन पीएम रहने के बाद 1 जून को इस्तीफा देना पड़ा। भाजपा 161 सांसदों के साथ सबसे बड़ी पार्टी थी। 144 सांसदों वाली दूसरी सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस के समर्थन से 44 सांसदों वाले देवेगौड़ा प्रधानमंत्री बने थे।

22 साल बाद किरदार बदले, कहानी वही; कांग्रेस के समर्थन से कुमारस्वामी सीएम: 104 विधायकों वाली सबसे बड़ी पार्टी भाजपा के येद्दियुरप्पा को बहुमत नहीं जुटा पाने के कारण इस्तीफा देना पड़ा है। अब देवेगौड़ा के बेटे और तीसरे नंबर पर रहे 37 विधायकों वाले कुमारस्वामी सीएम बनेंगे। उन्हें दूसरे नंबर पर रही कांग्रेस के 78 विधायकों का समर्थन हासिल है।

क्योंकि 104 विधायकों की पार्टी सरकार नहीं बना पाई और 37 विधायकों वाला सीएम बनेगा। क्योंकि उन्होंने बहुमत का आंकड़ा जुटा लिया। बहुमत ही लोकतंत्र की ताकत है।

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येद्दियुरप्पा इस्तीफे की घोषणा कर निकल रहे थे और सामने थे विधानसभा की दर्शकदीर्घा में बैठे कांग्रेस और भाजपा के रणनीतिकार।

शोभा कारनदलाजे: कर्नाटक से भाजपा की सांसद शोभा इस चुनाव में अमित शाह की कोर टीम में शामिल थीं।

मल्लिकार्जुन खड़गे: कांग्रेस सांसद। चुनावी कैंपेन में राहुल की टीम में थे। उन्हें अगला सीएम भी कहा जा रहा था।

अशोक गहलोत: टीम राहुल के अहम किरदार। नतीजों के बाद कांग्रेस हाईकमान ने उन्हें बतौर प्रभारी कर्नाटक भेजा था।

गुलाम नबी आजाद: कांग्रेस ने नतीजों के बाद कर्नाटक भेजा था। जेडीएस को गठबंधन बनाने का न्योता भी इन्होंने ही दिया।

अनंत कुमार: केंद्रीय मंत्री और कर्नाटक से भाजपा सांसद। भाजपा कोर टीम के सदस्य। अमित शाह के सबसे करीबी।

सदानंद गौड़ा: केंद्रीय मंत्री और कर्नाटक से भाजपा सांसद। भाजपा कोर टीम के सदस्य। स्टार प्रचारक भी थे।

महाभारत-2019 के अंतर्गत 52 भास्कर दृष्टि का आरंभ

संघर्ष पर्व

‘यन्नेहास्ति न कुत्रचित्’

अर्थात् जो विषय यहां (महाभारत में) नहीं है, वह कहीं नहीं है।

न कभी था। न है। न होगा।

हमारे भारत का महाभारत चुनाव ही हैं। आज कर्नाटक में घटे भीमकाय मंचन ने यही पुन: सिद्ध किया। जीवन में जो कुछ भी हो सकता है, हमारे चुनावों में हो चुका है।

इसी के साथ आने वाले आम चुनाव के लिए वर्षभर के संघर्ष की तैयारियां आरम्भ हो गईं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, हालांकि तीखा कटाक्ष करते रहते हैं कि देश में प्रत्येक घटना अब 2019 के चुनाव से जोड़ दी जाती है। किन्तु विचित्र होकर भी यही सत्य है।

कर्नाटक में क्या हुआ?

किसी को जनादेश नहीं मिला। त्रिशंकु सदन देखते ही कांग्रेस ने पलक झपकते जनता दल सेकुलर को सरकार मानकर, अपना समर्थन दे दिया। दावा प्रस्तुत कर दिया। यह प्रचंड गति थी। जिन गोवा, मणिपुर, मेघालय की भारी चर्चा अब हो रही है; वहां कांग्रेस घोंघा गति से चल रही थी। वहां भाजपा अति सक्रिय रही। विजय न होकर भी, हो गई। कर्नाटक में भी भाजपा, येद्दियुरप्पा की सरकार बना लेती। यदि सुप्रीम कोर्ट ने समय 15 दिन को घटाकर इतना कम न किया होता। और गुप्त मतदान को मना न किया होता। पिछली बार यहीं भाजपा ढेर सारे विधायकों को रिझाकर सत्ता में आई थी। किन्तु इस बार समय पर कुछ न करने से भयावह मात खा गई।

तो संघर्ष पर्व का आरम्भ प्रचंड गति का महिमा गान है। पराजित हों तो रणनीति बनाओ। मतदाताओं ने नहीं चुना - तो न्यायालय में चुनौती दो। जोड़ो। तोड़ो। मोड़ो। लड़ो। अनैतिक हो सकता है। किन्तु नैतिकता की प्रार्थना उसी प्रांगण में उचित लगेगी जहां राजधर्म के सच्चे मानदण्ड स्थापित हों। जहां नागरिकों का हित ही राजा का हित माना जाता हो।

यहां तो कुछ भी तय ही नहीं है। सब जुआ है। द्यूतक्रीड़ा। कपट-द्यूत।

एक प्रश्न उठा कि कर्नाटक में विजयी कौन रहा? चूंकि सर्वाधिक बड़ी संख्या तो भाजपा के पास है। और सत्तारुढ़ होने जा रहे दोनों दलों में मतभेद ही नहीं, मनभेद हैं। तो क्या वे बने रहेंगे? जद-एस कांग्रेस और भाजपा दोनों की सरकारों को समर्थन देकर गिरा चुकी है। बिहार में महागठबंधन था। आज कहां है? स्वयं नरेन्द्र मोदी के समक्ष चुनौती नं. 1 बने नीतीश कुमार अब उन्हीं के समर्थन व मित्र दलों वाली 20 सरकारों में से एक है। पूरी सरकार की सरकार भाजपा के पास स्वत: आ जाती है। या आ जाती ‘थी’। तो विजय के अनेक प्रकार हैं। गुजरात में हारकर भी कांग्रेस विजेता-गर्व लिए निखरी। उत्तरप्रदेश में जन्मजात शत्रु सपा-बसपा एक हुए। और अपराजेय मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को उनके ही संसदीय क्षेत्र में पराजित कर दिया। और चर्चा छिड़ी कि उत्तरप्रदेश विधानसभा में हुई हार का प्रतिशोध पूरा हुआ! धृतराष्ट्र के प्रश्न पर ऋषियों ने उत्तर दिया था कि यदि शत्रु की तुलना में हमारी सेना छोटी है, तो उसे समेटकर, थोड़ी ही दूर रखकर युद्ध लड़ना चाहिए। केवल विशाल सेना वाले ही इच्छानुसार, फैलकर लड़ सकते हैं।

समूचे विपक्ष का तो अभी पता नहीं, किन्तु कांग्रेस ने संभवत: इसे लागू कर दिया है। अब वह मध्यप्रदेश, राजस्थान में उत्साह से जा सकेगी। छत्तीसगढ़ जैसे राजनीतिक रूप से अति जागरूक राज्य में शक्तिशाली हो उतरेगी।

किन्तु युद्ध का विस्तार, प्रलयंकारी होगा। क्योंकि नरेन्द्र मोदी किसी भी पराजय को स्वीकार नहीं करते। अमित शाह, इस तरह कर्नाटक हारकर, पुन: राहुल गांधी से ‘हत्या के आरोपी’ जैसे आपत्तिजनक संबोधन सहन नहीं करेंगे। सभी देखेंगे, मोदी किस तरह राजनीति में भयानक गर्जना या भयावह सन्नाटा पैदा करेंगे। उनके पास विकराल संख्या है। 2019 का स्पष्ट लक्ष्य है। और नेतृत्वहीन विपक्ष है।

किन्तु योद्धा चारों ओर, सभी के खेमे में हैं। महाभारत में है कि ‘शूरवीरों और नदियों की उत्पत्ति का ज्ञान किसी को नहीं होता।’

इसलिए कभी दक्षिण से, तो कभी उत्तर से कोई भी, कभी भी पताका फहरा सकता है। व्यूह-रचना ही विजेता का तिलक करेगी।

कर्नाटक में प्रचंड गति की महिमा, विजय के

प्रकार व युद्ध का विस्तार

महाभारत-2019

कल्पेश याग्निक

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