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बिना उचित और कानूनी प्रक्रिया के गिरफ्तारी हुई तो समझो हम सभ्य समाज में नहीं रह रहे हैं: सुप्रीम कोर्ट

3 वर्ष पहले
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एससी-एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा, ‘किसी की भी गिरफ्तारी निष्पक्ष और उचित कानूनी प्रक्रिया के तहत ही होनी चाहिए। अगर बिना इस प्रक्रिया के किसी को सलाखों के पीछे भेजा जाता है, तो समझो कि हम सभ्य समाज में नहीं रह रहे हैं। प्रत्येक कानून को जीवन के अधिकार से संबंधित मौलिक अधिकार के दायरे में देखना होगा। इस अधिकार को संसद भी कम नहीं कर सकती।’ कोर्ट ने यह टिप्पणी केंद्र सरकार के रिव्यू पिटिशन पर सुनवाई के दौरान की। जस्टिस आदर्श गोयल और यूयू ललित की बेंच ने मामले में कोई अंतरिम आदेश पारित नहीं किया, यानी सुप्रीम कोर्ट का आदेश प्रभावी रहेगा। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस गोयल ने टिप्पणी की है कि जो भी कानून है, उसे अनुच्छेद-21 (जीवन के अधिकार) के दायरे में देखना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने मेनका गांधी संबंधी वाद में इस बाबत व्यवस्था दी थी। अनुच्छेद-21 के तहत जीवन के अधिकार का दायरा काफी बड़ा है और कानून को उसी चश्मे से देखना होगा। इस अधिकार को नहीं छीना जा सकता या कमतर नहीं किया जा सकता है। कोई इसे कम नहीं कर सकता, यहां तक कि संसद भी इस अधिकार से वंचित नहीं कर सकती। किसी की गिरफ्तारी बिना किसी निष्पक्ष प्रक्रिया के कैसे हो सकती है। इसे अनुच्छेद-21 के संदर्भ में अनिवार्य तौर पर देखना होगा। गिरफ्तारी ‌उचित कानूनी प्रक्रिया के तहत ही होनी चाहिए। अगर बिना निष्पक्ष प्रक्रिया के किसी को जेल भेजा जाता है तो हम सभ्य समाज में नहीं रह रहे हैं।

जीवन के अधिकार का दायरा काफी बड़ा है, कानून को उसी चश्मे से देखना होगा

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