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भाव नहीं बढ़ने से अफीम की खेती किसानों के लिए नहीं रही मुनाफे का सौदा, मजदूरी भी पड़ रही भारी

3 वर्ष पहले
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कभी गांव में रुतबे और अच्छी कमाई का सौदा माने जाने वाली अफीम की फसल आज अफीम किसानों के लिए घाटे का सौदा बन गई है। कड़ी मेहनत और हजारों रुपए खर्च करने के बाद भी किसान अपनी लागत भी नहीं निकाल पा रहा है। लगातार घाटे का सौदा बन रही अफीम की फसल को लेकर अब अफीम काश्तकार इससे कतराने भी लगे हैं। कई अफीम काश्तकार तो पट्टे मिलने के बाद भी इसकी खेती नहीं कर रहे हैं। लंबे समय से सरकार ने अफीम के भाव नहीं बढ़ाए, जबकि खर्चा दिनों-दिन बढ़ने से किसानों का मुनाफा लगातार कम हो रहा है। इसके बावजूद कई किसान अब भी अगले साल फायदा होने की उम्मीद में इसकी खेती जारी रखे हुए हैं।

अफीम की सरकारी दर कम होने नहीं निकलता खर्च : किसान को दिए जाने वाले 10 आरी के पट्टे में कुल खर्च 50 हजार रुपए के करीब आता है, लेकिन इसके एवज में काश्तकार को लगभग 40 हजार रुपए की ही कमाई ही हो पाती है। अफीम काश्तकार को सरकार काश्तकारों को अच्छी किस्म की अफीम और अच्छी औसत देने पर प्रति किलो अफीम का 1500 से 3500 रुपए तक भुगतान करती है। ऐसे में किसान को इससे 12 से 15 हजार रुपए की आय होती है। इसके साथ ही पोस्त दानों से किसानों को लगभग 25 हजार रुपए तक की आमदनी हो जाती है। वहीं अफीम की चिराई, लुवाई, निराई, गुडाई, मजदूरी, दवा और बीज पर लगभग 50 हजार रुपए खर्च हो जाते हैं। लगातार बढ़ रही मजदूरी के कारण यह खर्च भी बढ़ता जा रहा है। इसके साथ ही कई बार पानी की कमी पर टैंकर से पिलाई करनी पड़ती है। इस पर भी लगभग 2 हजार रुपए तक खर्च आता है। इससे किसानों को 8 से 10 हजार रुपए तक घाटा उठाना पड़ रहा है। 2014-15 में सरकार 125 रुपए किलों के हिसाब से अफीम डोडा-चूरा खरीदती थी, जिससे किसानों को करीब 12 से 15 हजार रुपए मिलते थे, जिससे उनका खर्च निकल जाता था। इसके साथ ही पूर्व में पट्टे भी ज्यादा आरी के होने के कारण किसानों को कुछ मुनाफा हो जाता था, लेकिन पिछले वर्ष से पट्टे भी 10 आरी के कर दिए जाने से किसानों का नुकसान बढ़ गया है।

अब तक आई 23 हजार 654 किलो अफीम

प्रतापगढ़. तोल केंद्र पर अफीम का तोल करवाते अधिकारी।

प्रतापगढ़ | धरियावद नाका स्थित अस्थाई अफीम तोल केंद्र पर अंतिम दिन रविवार को 14 गांवों के 93 काश्तकारों की अफीम का तोल किया गया। इस तोल के साथ ही पिछले 12 दिनों से चल रहा अफीम तोल का कार्य भी समाप्त हो गया। जिला अफीम अधिकारी महावीर सिंह ने बताया कि अब तक विभाग ने 165 गांवों के 33416 किसानों की 23 हजार 654.560 किलो अफीम का तोल किया। इसके बदले विभाग की ओर से किसानों को 3 करोड़ 56 लाख 58 हजार 298 रुपए का भुगतान किया गया। रविवार को मेरियाखेड़ी, धमोतर, जहाजपुरा, झांतला, अमलावद, सावाखेड़ा, सन्नोटी, बरखेड़ी रावजी, चाचाखेड़ी, बोरदिया, चंदेरा, बेलारी, सेलारपुरा खुर्द और टकरावद गांव के 93 कल्टीवेटरों की अफीम का तोल किया। इसके साथ ही अफीम के तोल का कार्य समाप्त हो गया। अस्थाई तोल केंद्र पर अंतिम गांवों के तोल के बाद अफीम को सीलबंद कंटेनर में नीमच स्थित अफीम फैक्ट्री के लिए सुरक्षा के साथ रवाना किया। इस दौरान इंस्पेक्टर प्रदीप लोर, साैमित्र बैनर्जी, सब इंस्पेक्टर मुकेश धनोतिया सहित अन्य अधिकारी कर्मचारी मौजूद थे।

तोल जल्दी होने से किसान खुश

तोल केंद पर इस बार काश्तकारों को अपनी अफीम के तोल के लिए ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ रहा है। अफीम काश्तकारों ने बताया कि पिछले कई सालों से तोल पूरा होने तक शाम हो जाती थी और उन्हें घर पहुंचने तक रात हो जाती थी, लेकिन इस बार विभागीय अधिकारियों के बेहतर इंतजाम के कारण दोपहर तक ही सभी काश्तकारों का तोल हो रहा है। इससे किसानों के समय की काफी बचत हुई है।

क्या कहते हैं अफीम काश्तकार

अफीम से चिराई के पैसे भी नहीं निकलते

सरकार की तरफ से दिए जाने वाले अफीम के दाम से चिराई के पैसे भी नहीं निकल पाते हैं। किसान इस बार नहीं तो अगली बार मुनाफे के चक्कर में पट्टा बरकरार रखे हुए हैं। देवीचंद गुर्जर, अफीम काश्तकार, छायण पीपल्या

नुकसान का सौदा साबित हो रही अफीम

अफीम की खेती अब नुकसान का सौदा साबित हो रही है। अफीम के मूल्य से ज्यादा गेहूं का मूल्य मिल रहा है। सरकार लगातार औसत बढ़ा रही है, लेकिन अफीम के दाम नहीं बढ़ा रही है। अब सरकार ने मार्फिन का नियम और जोड़ दिया है। परसराम पाटीदार, मुखिया, बरड़िया

अफीम का भाव 5 हजार रुपए किलो हो

अफीम की खेती सिर्फ नाम के लिए रह गई है। मौसम परिवर्तन के कारण कई बार औसत नहीं बैठ पाती है। अफीम काश्तकार की लागत ही नहीं निकल पा रही है। सरकार अफीम के भाव 5 हजार रुपए किलो करे, तो किसानों को कुछ राहत मिले। मदनलाल पाटीदार, मुखिया, काजली खेड़ा

पहले कम खर्च में होती थी अच्छी पैदावार

आज के समय में अफीम की खेती काफी महंगी हो गई है। पहले कम खर्च में अच्छी पैदावार हो जाती थी। अब मौसम भी अनुकूल नहीं रहा है साथ ही दवाओं व मजदूरी का खर्च बढ़ गया है। काश्तकार पट्टे बचाने के लिए अफीम की खेती कर रहा है। खेती में खर्च निकालना भी भारी पड़ रहा है। मानशंकर दवे, मुखिया, अरनोद

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