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सालभर पहले स्मार्ट विलेज घोषित 31 गांवों में कराने थे 7 काम, हुआ कुछ नहीं, अब भी सबसे गंदे इलाके

3 वर्ष पहले
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गांवों को शहर की तर्ज पर विकसित करने के लिए सरकार ने स्मार्ट विलेज योजना शुरू की। जिले में भी 31 गांवों का चयन स्मार्ट विलेज के रूप में किया गया। इन गांवों में 7 काम करवाए जाने थे, जिससे गांव में प्रवेश करते ही इन गांवों का लुक शहरों की तरह लगे, लेकिन इन सात कामों में से एक काम भी नहीं हो पाया। इनमें से जिले में एक गांव भी साफ सुधरा और शहरों की तरह नहीं बन पाया है।

इन गांवों के नाम कागजों में स्मार्ट के रूप में तो दर्ज हो चुके हैं, लेकिन हकीकत में यदि गांव में प्रवेश कर देखा जाए तो धूल के गुबार, सड़कों पर बहता पानी, सड़ांध मारती नालियां दिखाई देंगी। सरकार ने एक साल पहले गांवों में पलायन रोकने और वहां भी शहरों की तरह ही वातावरण विकसित करने के लिए स्मार्ट विलेज की घोषणा की थी। इस योजना में 2011 की जनसंख्या के अनुसार 3 हजार से अधिक आबादी वाले 31 गांवों को सम्मिलित किया गया है। इन गांवों में जल निकासी प्रबंधन, पक्की नालियों का निर्माण, दो लाख रुपए की लागत से सामुदायिक शौचालय निर्माण, सार्वजनिक पार्क, खेल मैदान का निर्माण, चारागाह विकास के लिए खाई, मिट्टी की चारदीवारी निर्माण, गौरव पथ एवं मुख्य मार्ग पर सार्वजनिक प्रकाश व्यवस्था, एलईडी लाईन या सोलर लाइट लगवाने का काम, गांवों में नियमित स्वच्छता, सफाईकर्मी एवं कचरा परिवहन के लिए किराए के ट्रैक्टर-ट्रॉली या रिक्शा की व्यवस्था करना, दो मुख्य मार्गों को स्वराज मार्ग के नाम पर विकसित करने के काम होने हैं, लेकिन अभी तक इन गांवों में एक काम भी नहीं हो पाया है। प्रशासन का मानना है कि इन सभी 31 गांवों में स्मार्ट विलेज बनाने का काम लगभग पूरा हो गया है, लेकिन इसकी हकीकत जानने के लिए भास्कर टीम ने ग्राउंड रिपोर्ट तैयार की जहां इन दावों में कोई सच्चाई नहीं मिल पाई।

खानपुर. सरकार सालभर पहले स्मार्ट विलेज घोषित किया, हालात ऐसे है कि घुसते गंदे पानी से राहगीरों को निकलना पड़ता है।

प्रशासनिक दावों का सच

स्मार्ट विलेज योजना का सच यदि देखना हो तो जिला मुख्यालय के नजदीकी गांव मंडावर में देखा जा सकता है। यहां पर न तो जल निकासी की बेहतर व्यवस्था है और न ही गांव के अंदर पक्की नालियां। सार्वजनिक पार्क और खेल मैदान की बातें तो जल निकासी की बेहतर व्यवस्था नहीं होने के चलते मुख्य सड़कों पर पानी भरा रहता है। कस्बे में अंदर प्रवेश करते ही गंदगी के ढेर लगे दिखाई देते हैं और सड़ांध मारते कचरे से लोगों का मुख्य प्रवेश मार्ग से निकलना दूभर हो जाता है।

संसदीय सचिव नरेंद्र नागर का विधानसभा क्षेत्र खानपुर। इस विधानसभा क्षेत्र में खानपुर मुख्यालय को ही स्मार्ट विलेज घोषित कर रखा है। बड़े व्यापारिक कस्बे में इसका शुमार भी होता है, लेकिन जब खानपुर में प्रवेश करते हैं तो वहां सड़ांध मारती नालियों की बदबू से लोगों का स्वागत होता है। यहां स्मार्ट विलेज के पहले बिंदु जल निकासी प्रबंधन और पक्की नालियों के निर्माण में ही अधिकारी फेल हो गए हैं। प्रकाश व्यवस्था की बात करें तो बिजली के पोलों पर लगी लाइटें बंद रहती हैं।

पनवाड़, हरिगढ़, दहीखेड़ा भी कहने को स्मार्ट विलेज हैं, लेकिन हकीकत इसके उलट है। इन तीनों गांवों को खुले में शौचमुक्त भी कर रखा है, लेकिन यह गांव न तो खुले में शौच मुक्त हो पाए और न ही इनमें साफ सफाई हो पाई। हालात यह हैं कि पंद्रह दिनों में भी नालियों की सफाई नहीं हो पाती है। प्रकाश व्यवस्था की बात करें तो यहां शाम से ही सड़कों पर अंधेरा पसरा रहता है। इन गांवों में किसी भी मुख्य मार्ग को स्वराज मार्ग के नाम से विकसित नहीं किया गया है।

रीछवा, भालता, आवर क्षेत्र में स्मार्ट विलेज योजना के तहत काम नहीं हो पाए। यहां पर सफाई से लेकर गांव में रोशनी की व्यवस्था नहीं है। रात में लाइटें नहीं जलने से लोगों को अंधेरे में सफर करना पड़ता है। इन गांवों में प्रवेश करते ही गंदगी और कीचड़ लोगों को दिखाई देता है। मेगा हाइवे पर बसा हुए रायपुर कस्बे के भी यही हालात हैं। यहां सरकारी भवनों के आसपास ढेरों कचरा पड़ा रहता है। कस्बे के अंदरूनी क्षेत्र में कचरा सड़ांध मारता है। नियमित सफाई व्यवस्था है और न ही बेहतर प्रकाश व्यवस्था।

गांवों में घुसते ही दुर्गंध से वास्ता, रात में प्रकाश की व्यवस्था भी फेल

जिले के ये गांव शामिल किए गए थे स्मार्ट विलेज योजना में

स्मार्ट विलेज योजना में घाटोली, भालता, रीछवा, रटलाई, बड़ाय, बकानी, सरोद, पगारिया, मिश्रौली, गुराड़ियाजोगा, गुराड़ियामाना, आवर, उन्हैल, चौमहला, गंगधार, डग, मंडावर, डूंगरगांव, असनावर, तारज, सारोला, पनवाड़, खानपुर, हरिगढ़, दहीखेड़ा, चांदखेड़ी, मनोहरथाना, सुनेल, रायपुर, कडोदिया, हेमड़ा को शामिल किया गया था।

स्मार्ट विलेज नहीं बनने के कारण

स्मार्ट विलेज की घोषणा के बाद अधिकारियों ने गांवों की सूची तो तैयार कर ली, लेकिन इसके बाद किसी भी स्तर पर इसका रिव्यू नहीं हो पाया। इसी का नतीजा था कि अधिकारी सूची तैयार कर भूल गए। इन गांवों के बाशिंदों को ही पता नहीं है कि उनके गांवों को कब स्मार्ट विलेज घोषित किया गया। गांवों में सबसे मुख्य समस्या साफ सफाई से लेकर रोशनी की है। जबकि पार्क, खेल मैदानों के निर्माण तो हो ही नहीं पाए हैं।

जिले में 31 स्मार्ट विलेज घोषित हो चुके हैं। इन गांवों में अधिकतर काम पूरे हो चुके हैं। चंद्रशेखर, एक्सईएन, जिला परिषद, झालावाड़

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