भोईखेड़ा में Rs.1 करोड़ से बनेगा योद्धा गोरा-बादल का पैनोरमा
भास्कर संवाददाता | चित्तौड़गढ़
भोईखेड़ा क्षेत्र भी अब पर्यटन और इतिहासकारों के लिए प्रमुख स्थान बनेगा। यहां राजस्थान राज्य प्रोन्नति प्राधिकरण गोरा-बादल की स्मृति में पैनोरमा बना रहा है। करीब सवा करोड़ रुपए से बनने वाले पैनोरमा के लिए उच्चस्तरीय निर्देश पर जिला प्रशासन ने भोईखेड़ा में पौन बीघा जमीन आरक्षित की है। यहां प्रस्तावित दौरे में सीएम वसुंधराराजे इस का अवलोकन कर सकती हैं।
चित्तौड़ी खेड़ा के निकट गंभीरी नदी के पास संत रैदास पेनोरमा का कार्य अंतिम चरण में है। सब कुछ ठीक रहा तो दूसरा पैनोरमा इसी नदी के तट पर भोईखेड़ा में बनेगा। इतिहासकारों के अनुसार भोईखेड़ा में इसी जगह गोरा-बादल का बलिदान माना जाता है। कलेक्टर इंद्रजीत सिंह ने गत दिनों निरीक्षण किया।
प्रशासन ने की जमीन आरक्षित, जिले में तीसरा पैनोरमा, रैदास पैनोरमा पूरा, परशुराम पैनोरमा का काम जल्द शुरू होगा
पदमावत फिल्म को लेकर हुए विवाद के बाद आगे बढ़ी पैनोरमा की योजना
मौजूदा सरकार विभिन्न जिलों व क्षेत्र में वीर योद्धाओं, महापुरुषों के पैनोरमा बना रही है। चित्तौड़ में संत रैदास के नाम करीब पौने दो करोड़ रुपए की लागत से पैनोरमा बनवाया। इतिहास के साथ सामाजिक समरसता का संदेश देना भी इसका कारण है। इस बीच गत साल पदमावत फिल्म विवाद के कारण भारी बवाल मचा। फिल्म के विरोध में राजपूत समाज उद्वेलित हुआ। इसके बाद पदमिनी के इतिहास से जुड़े राजपूत वीर गोरा-बादल की स्मृति में भी पैनोरमा बनाने का निर्णय लिया गया।
चित्तौड़गढ़ में गोरा-बादल पैनोरमा बनेगा। स्वीकृति के लिए फाइल राज्य सरकार के पास भेज दी है। जमीन आवंटन हो चुका है। इस पैनोरमा में उनके शौर्य, बलिदान के साथ जौहर की घटना को प्रदर्शित किया जाएगा। इसका स्वरूप क्या रहेगा। इस पर कार्य अब होगा। औंकारसिंह लखावत, अध्यक्ष राजस्थान राज्य प्रोन्नति प्राधिकरण
भोईखेड़ा क्षेत्र में गोरा-बादल पैनोरमा की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। इसके लिए पौन बीघा जमीन आरक्षित की है। निर्माण की पूरी योजना राजस्थान राज्य प्रोन्नति प्राधिकरण बनाएगा। सुरेशचंद्र खटीक, एसडीएम चित्तौड़गढ़
इतिहास... भोईखेड़ा माना जाता है गोरा-बादल का बलिदान स्थल... चित्तौड़ के इतिहास में गोरा-बादल वीर योद्धा के रूप में प्रसिद्ध हैं। जो रिश्ते में काका-भतीजा थे। गोरा 60 वर्ष पार और बादल 13-14 साल के किशोर थे। कुछ ऐतिहासिक ग्रंथों व तथ्यों में कहा गया है कि अलाउद्दीन खिलजी ने आक्रमण के लिए गंभीरी नदी किनारे भोईखेड़ा क्षेत्र में पड़ाव डाला था। ये दोनों रावल रतनसिंह को खिलजी के कब्जे से छुड़वाने के दौरान इसी जगह वीरगति को प्राप्त हुए। भोईखेड़ा के एक खेत में कुछ दूरी पर पत्थर की दो प्रतिमाएं लगी हैं। जिनको ही गोरा-बादल स्मारक माना जाता है। क्षेत्र का एक परिवार सालों से पूजा-अर्चना करता आ रहा है। भोईखेड़ा में कुछ जगह टूटे-फूटे पत्थर बिखरे पड़े हैं। जिन्हें प्राचीन प्रतिमाओं या शिलाओं के अवशेष माना जाता है। वर्ष 1927 में वीएन मिश्रा ने एक किताब लिखी थी। जिसमें भी भोईखेड़ा के महत्व को प्रदर्शित किया गया था।