पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें
  • Hindi News
  • National
  • संविधान निर्माता के साथ राष्ट्र निर्माता डॉ. आंबेडकर

संविधान निर्माता के साथ राष्ट्र निर्माता डॉ. आंबेडकर

3 वर्ष पहले
  • कॉपी लिंक
1942 से 1946 के बीच वाइसराय काउंसिल में श्रमिकों संबंधी मामलों के सदस्य के रूप में डॉ. आंबेडकर कई श्रम सुधारों के माध्यम बने थे। उन्होंने नवंबर 1942 में नई दिल्ली में इंडियन लेबर कॉन्फ्रेंस के 7वें अधिवेशन में काम के घंटे 12 से घटाकर 8 घंटे प्रस्ताव रखा। उन्होंने महंगाई भत्ता, छुट्टियां, बीमा, मेडिकल लीव, समान काम के लिए समान वेतन, न्यूनतम वेतन और वेतनमानों की समय-समय पर समीक्षा जैसे कई कदम उठाए। श्रम संगठनों को मजबूत बनाया और देशभर में रोजगार कार्यालय खोले।

भारतीय रिजर्व बैंक की परिकल्पना, महिलाओं की सामाजिक स्थिति में सुधार, जल आयोग और बिजली वितरण के लिए ग्रिड बनाने में अहम भूमिका निभाई
महिलाओं के हक की लड़ाई में इस्तीफा दे दिया
जब महिलाओं के हक के लिए उनके द्वारा लाया गया हिंदू कोड बिल संसद में पारित नहीं हुआ तो उन्होंने कानून मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया। बिल के दो उद्‌देश्य थे हिंदू महिलाओं को संपत्ति व अन्य अधिकार देकर उनका सामाजिक दर्जा उठाना व जातिगत असमानता दूर करना। बाबासाहेब ने कहा था, ‘मैं किसी समाज की प्रगति को उसकी महिलाओं की प्रगति से आंकता हूं।’ बाद में 1955-56 में हिंदू विवाह अधिनियम, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम आदि पास होने पर डॉ. आंबेडकर जो चाहते थे वह कुछ हद तक पूरा हुआ।

भारतीय रिजर्व बैंक की अवधारणा दी थी
डॉ. आंबेडकर ने हिल्टन कमीशन (जिसे रॉयल कमीशन ऑन इंडियन करेंसी एंड फाइनेंस भी कहा जाता था) को दी गई गाइडलाइन के आधार पर भारतीय रिजर्व बैंक की कल्पना की। इस धारणा को उन्होंने अर्थशास्त्र पर अपनी पुस्तक ‘द प्रॉब्लम ऑफ द रूपी- इट्स ओरिजिन एंड इट्स सॉल्यूशन’ में भी रखा था।

काम के घंटे 12 से घटाकर 8 किए
‘मूकनायक’ का प्रकाशन
1920 में उन्होंने मुंबई में साप्ताहिक ‘मूकनायक’ का प्रकाशन शुरू किया। फिर दलितों को शिक्षित करने के पहले संगठित प्रयास में बहिष्कृत हितकारिणी सभा का गठन किया। दलित अधिकारों की रक्षा के लिए उन्होंने मूक नायक के अलावा ‘बहिष्कृत भारत’ और ‘इक्वलिटी जनता’ का प्रकाशन भी शुरू किया।

कश्मीर को विशेष दर्जा देने से साफ इनकार किया
आंबेडकर ने जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 का मसौदा लिखने से साफ मना कर दिया था। उन्होंने शेख अब्दुल्ला से साफ कहा, ‘आप चाहते हैं भारत आपकी सीमाओं की रक्षा करे, आपके क्षेत्र में सड़कें बनाएं, आपको अनाज सप्लाई करे और कश्मीर को भारत में समान दर्जा मिले। लेकिन भारत के लोगों को कश्मीर में कोई अधिकार नहीं होगा। ऐसे प्रस्ताव को सहमति देना भारत के हितों के खिलाफ होगा और भारत के कानून मंत्री के रूप में मैं ऐसा कभी नहीं करूंगा।’

पानी व बिजली पर राष्ट्रीय नीति के पैरोकार
केंद्र और राज्यों में सिंचाई परियोजनाओं के विकास के लिए उन्होंने केंद्रीय जल आयोग की स्थापना की। इसी तरह विद्युत क्षेत्र के विकास के लिए सेंट्रल टेक्नीकल पावर बोर्ड और सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी की स्थापना में मुख्य भूमिका निभाई। उन्होंने बिजली वितरण के ग्रिड सिस्टम (जिस पर देश आज भी निर्भर है) और इंजीनियरिंग की शिक्षा पर जोर दिया।

बिहार व मध्य प्रदेश के विभाजन का सुझाव
अपनी पुस्तक ‘थाॅॅट्स ऑन लिंग्विस्टिक स्टेट्स’ में आंबेडकर ने मध्य प्रदेश और बिहार को विभाजित करने का सुझाव दिया था। उस किताब के प्रकाशन के 45 वर्षों बाद उनके सुझाव के मुताबिक दोनों राज्यों का विभाजन कर झारखंड और छत्तीसगढ़ का गठन हुआ। उन्होंने भाषा के आधार पर राज्य बनाने के बारे में चार बातें ध्यान में रखने को कहा था एक, कुशल प्रशासन की जरूरतें ध्यान में रखें। दो, विभिन्न क्षेत्रों की आवश्यकताएं। तीन, विभिन्न इलाकों के लोगों की भावनाएं और चार, बहुसंख्यक और अल्पसंख्यकों की आबादी का अनुपात।

वह गेंदे का हार
1942 में नागपुर की यात्रा में जर्जर साड़ियां पहनीं महिलाओं के एक समूह ने उन्हें रोका और गेंदे के हार से उनका स्वागत किया। यह तोहफा देने के लिए उन्होंने जलाऊ लकड़ी और घास का अतिरिक्त बंडल बेचा था। इससे अत्यंत भावुक हो उठे आंबेडकर ने वादा किया कि वे उनका जीवनस्तर ऊंचा उठाने का पूरा प्रयास करेंगे।

तीन किताबें, जिन्होंने आंखों में आंसू ला दिए
डॉक्टर साहेब आधा वेतन किताबों पर खर्च करने की सलाह दिया करते थे। अपने जीवन के अंतिम समय तक उनके पास इतनी किताबें इकट्‌ठी हो गई थीं कि वे उन्हें बेचकर लाखों रुपए इकट्‌ठा कर सकते थे। पर उन्होंने यह सारा संग्रह मुंबई के एक कॉलेज को दान कर दिया। बाबासाहेब ने अपने एक निकटवर्ती को बताया था कि तीन किताबों ने उनकी आंखों में आंसू ला दिए थे। लाइफ ऑफ टॉलस्टाॅय। विवाह के पहले मुलाकातों में उन्होंने शारदा कबीर को भी यह किताब दुखी वैवाहिक जीवन के वर्णन के उदाहरण स्वरूप पढ़ने को कहा था। विक्टर हूयूगो की ‘ले मिज़राब्ल’ और थॉमस हार्डी की ‘फार फ्राॅम द मेडिंग क्राउड’ दो अन्य किताबें थीं। अखबार पढ़ने का भी उन्हें शौक था और पढ़ने के बाद दशकों तक वे उनकी कतरनें अपने फोल्डर में एकत्रित करते रहे थे।

खबरें और भी हैं...