- Hindi News
- National
- खतियान के आधार पर आरक्षण की सिफारिश संविधान और सरकार की नीति के भी खिलाफ
खतियान के आधार पर आरक्षण की सिफारिश संविधान और सरकार की नीति के भी खिलाफ
नियोजन एवं स्थानीय नीति में संशोधन के लिए मंत्री अमर कुमार बाउरी की अध्यक्षता वाली कमेटी ने नियुक्तियों में खतियान को आरक्षण का आधार बनाने की सिफारिश की है। लेकिन यह संविधान और सरकार की नीति के भी खिलाफ है। क्योंकि भूमिहीनों को आरक्षण की ज्यादा जरूरत है और इस सिफारिश से वे ही आरक्षण से वंचित हो जाएंगे।
राज्य सरकार ने करीब एक लाख भूमिहीनों को जमीन देने की बात कही है। फिर उन्हें ही आरक्षण से वंचित कैसे कर दिया जाएगा। ऐसे में कमेटी की सिफारिशों को लागू करना मुश्किल होगा। राज्य के विभिन्न जिलों में अलग-अलग तिथि को हुए सर्वे और रिविजनल सर्वे के कारण सरकार के लिए कट ऑफ डेट तय करना भी विवाद का कारण बन सकता है। हालांकि कमेटी ने खतियान के लिए कट ऑफ डेट की अनुशंसा नहीं की है।
भू राजस्व विभाग से प्राप्त दस्तावेज के अनुसार राज्य में अब तक तीन तरह के सर्वे हो चुके हैं। कैडस्ट्रल सर्वे, रिविजनल सर्वे और हाल में नए सिरे से फिर रिविजनल सर्वे जारी है। कई जिलों के विभिन्न अंचलों का सर्वे 2016 तक पूरा हुअा है। कई अंचलों के रिविजनल सर्वे का काम तो पूरा हो चुका है, लेकिन वह अब तक सरकार द्वारा अधिसूचित नहीं किया गया है।
एक लाख भूमिहीनों को जमीन देने की बात कह चुकी है सरकार
सर्वे है खतियान में रैयत के नाम का आधार
जमीन का सर्वे ही तय करता है कि खतियान में किस रैयत का नाम होगा। सर्वे के द्वारा यह तय किया जाता है कि अमुक जमीन का मालिक अमुक व्यक्ति है। आपत्ति के बाद जब यह फाइनल हो जाता है कि कोई जमीन का मालिक है तो उसका नाम खतियान (रेकर्ड ऑफ राइट) में दर्ज हो जाता है। अगर किसी जिले में आजादी से पूर्व सर्वे हुआ था। उस समय तैयार खतियान में दर्ज रैयत द्वारा अपनी जमीन की बिक्री कर दी गई है और बाद में अगर रिविजनल सर्वे नहीं हुआ तो अब भी खतियान में बिक्री करनेवाले रैयत का ही नाम दर्ज रहेगा।
कहीं पूरा हो चुका तो कहीं अधूरा है रिविजन सर्वे
झारखंड में 1932 में सर्वे सेटलमेंट हुआ था। उसके बाद अलग-अलग जिलों का अलग-अलग वर्षों में रिविजनल सर्वे किया गया। बंदोबस्त कार्यालय पलामू के अधीन पलामू और गढ़वा के विभिन्न अंचलों का रिविजनल सर्वे 2008 से 2017 के बीच पूरा हुआ। लेकिन लातेहार के अंचलों का रिविजनल सर्वे 2005 में हुआ। इसी तरह धनबाद और बोकारो रिविजनल सर्वे 2007 से 2014 के बीच पूरा हुआ। लेकिन हजारीबाग बंदोबस्त कार्यालय के अधीन आनेवाले हजारीबाग, कोडरमा, बोकारो, गिरिडीह, चतरा और रामगढ़ जिले में रिविजनल सर्वे हुआ ही नहीं। यहां कैडस्ट्रल सर्वे का काम 1909 से 1912 के बीच हुआ था। यह 109 वर्ष पुराना है। बंदोबस्त कार्यालय सिंहभूम के अधीन के जिलों में रिविजनल सर्वे 1960 से 65 के बीच पूरा हुआ था। रांची बंदोबस्त कार्यालय के अधीन रांची, खूंटी और सिमडेगा जिले का रिविजनल सर्वे का काम 1927-35 के बीच पूरा हुआ था। लेकिन रांची बंदोबस्त कार्यालय के अधीन ही आनेवाले लोहरदगा का रिविजनल सर्वे 1975 से 1994 के बीच पूरा हुआ। वहीं गुमला का 2014 में। इसी तरह गोड्डा, देवघर, जामताड़ा, राजमहल, साहेबगंज और पाकुड़ का रिविजनल सर्वे 1922-35 के बीच हुआ था।
खतियान के आधार पर आरक्षण कानूनन सही नहीं
भू-राजस्व विभाग से जुड़े एक जानकार का कहना है कि इस देश में लाखों की संख्या में ऐसे लोग हैं जो भूमिहीन हैं। सरकार उन्हें भूमि उपलब्ध करा रही है। लेकिन ऐसे भूमिहीनों को आरक्षण के लाभ से वंचित नहीं किया जा रहा। इसलिए खतियान में नाम होने पर ही किसी को आरक्षण का लाभ दिया जाए, यह कानूनी रूप से सही नहीं है।