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- 4 माह तक खातों में नहीं डाली फसल बीमा राशि 30 की जगह व्यवस्थापक दे रहे थे Rs. 16 हजार
4 माह तक खातों में नहीं डाली फसल बीमा राशि 30 की जगह व्यवस्थापक दे रहे थे Rs. 16 हजार
पाली सेंट्रल कोऑपरेटिव बैंक के अधिकारियों की एक और गड़बड़ी सामने आई है। किसानों को मिलने वाले प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के मुआवजे में बैंक अधिकारी व्यवस्थापकों के माध्यम से किसानों से उगाही कर रहे थे। बीमा कंपनी ने नवंबर में ही पाली सेंट्रल को-ऑपरेटिव बैंक पाली को फसल बीमा की राशि जारी कर दी थी। यह राशि सीधे किसानों के खातों में ट्रांसफर की जानी थी। लेकिन बैंक ने न केवल इसे चार माह तक रोके रखा बल्कि नियम विरुद्ध जाकर इसके भुगतान के लिए बीच में ग्राम सेवा सहकारी समितियों के व्यवस्थापकों को डाल दिया। व्यवस्थापकों का कारनामा देखिए कि उन्होंने किसानों की पासबुक भी अपने पास रख ली और राशि का भुगतान करवाने के लिए उनसे आहरण पर्चियां भी भरवा ली। किसानों काे यह तक नहीं पता कि उन्हें कितनी राशि मिली है या कितनी कटौती की जा रही है। व्यवस्थापक लगभग आधी राशि काटकर किसानों को देने लगे तो कुछ किसान शिकायत लेकर कलेक्टर सुधीर कुमार शर्मा के पास पहुंचे तब पूरा मामला सामने आया। कलेक्टर के दखल के बाद किसानों के बैंक खातों में राशि भी ट्रांसफर हुई और उन्हें पासबुक भी जारी की गई। कलेक्टर के माध्यम से बैंक के मुख्यालय पहुंची शिकायत के लिए तीन सदस्यीय जांच टीम गठित की गई है। गठित जांच कमेटी के अधिकारी शुक्रवार को पाली पहुंचे और पीड़ित किसानों के बयान लेकर दस्तावेजों की जांच की। जानकारी के अनुसार किसानों की फसल बीमा मुआवजा राशि और अनुदान राशि पाली सेंट्रल को-ऑपरेटिव बैंक में जमा होती है। लेकिन, किसानों का आरोप था कि मुआवजा राशि जो जमा हुई उसके अनुसार अभी तक मिली भी नहीं। इतना ही नहीं कृषि आदान अनुदान राशि भी उन्हें समय पर नहीं मिलती। इसमें भी व्यवस्थापकों के माध्यम से कटौती होती है। जांच कमेटी में उप महाप्रबंधक पीयूष जी. नारायण, वसूली प्रकोष्ठ के सहायक महाप्रबंधक विनोद कुमार बोचलिया और जोधपुर क्षेत्रीय कार्यालय के सहायक महाप्रबंधक विष्णु रूपाणी ने कलेक्ट्रेट कार्यालय में पीड़ित किसानों से मुलाकात कर किसानों के बयान लिया।
इसके साथ ही बैंक डायरी में मिली अनियमितताओं को लेकर भी दस्तावेज जुटाए।
कलेक्टर तक शिकायत पहुंची किसानों के खातों में रुपया डाला, अब राजस्थान स्टेट को -अॉपरेटिव बैंक की जांच टीम पहुंची पाली
सबसे बड़ा सवाल
किसानों को पता तक नहीं चलता उन्हें किस मद में कितना रुपया मिलना था और बैंक अधिकारियों ने कितना रखा
यह मामला किसानों में जागरूकता की कमी को भी बताता है। किसान जिस राशि को कृषि आदान अनुदान की समझ रहे थे दरअसल वह प्रधानमंत्री फसल बीमा की थी। बीमा कंपनी ने यह मुआवजा राशि उन्हें दी थी। किसान हर बार की तरह इसमें भी ग्राम सेवा सहकारी समित को कमीशन देने को तैयार थे। लेकिन बड़ी कटौती देख उन्होंने कलेक्टर सुधीर कुमार शर्मा को शिकायत की तो पूरा मामला सामने आया। कलेक्टर की सख्ती के बाद ही यह राशि किसानों के खातों में सीधे जमा हुई और अब जांच टीम गठित हुई।
तीन साल से बैंक डायरी नहीं, अब डायरी भी दी तो एक साल का ही स्टेटमेंट जांच कमेटी के सामने किसानों ने बताया कि तीन साल से बैंक की ओर से खातों की डायरी तक नहीं दी गई थी। इतना ही नहीं जब कलेक्टर तक मामला पहुंचा तो किसानों को बैंक से डायरी दी गई लेकिन इसमें भी एक साल का ही स्टेटमेंट था।
बैंक अधिकारियों की मंशा पर सवाल- जाे राशि सीधे किसान के खाते में जमा होनी थी वह समितियों के माध्यम से दे रहे थे नकद, वह भी आधी अधूरी, पूरे मामले में यह कर रहे थे व्यवस्थापक गड़बड़ी
बीमा कंपनी ने नवंबर में ही किसानों को फसल बीमा की मुआवजा राशि पीसीसीबी को जारी कर दी थी। लेकिन बैंक ने रोके रखी
यह रुपया सीधे बैंक को किसानों के खाते में जमा करवाना था। लेकिन नियमों की अनदेखी कर उन्होंने ग्राम सेवा सहकारी समिति (जीएसएस) को लूप में लिया।
बड़ी शिकायत साली गांव के किसानों की थी। व्यवस्थापक व बैंक अधिकारियों ने किसानों की पास बुक तक खुद के पास रख रखी थी। उसमें पिछले लेन-देन तक की एंट्री नहीं है।
फसल बीमा का यह रुपया आया तो व्यवस्थापक ने सभी किसानों से आहरण पर्ची भी भरवा ली। वह एकमुश्त उनके रुपए निकालकर किसानों को भुगतान करने वाला था।
करीब 30 से 33 हजार रुपए प्रति किसान को मिलने वाला था। इसमें से व्यवस्थापक उन्हें 16 हजार ही दे रहा था।
किसानों की शिकायत पर कलेक्टर ने तलब किया तो खुलासा हुआ भ्रष्टाचार का, अब जांच टीम जुटाएगी सबूत
कलेक्टर ने इस मामले की जानकारी राजस्थान स्टेट को-ऑपरेटिव बैंक के एमडी को दी। इस पर एमडी विद्याधर गोदारा ने जांच टीम गठित की। यह जांच टीम शुक्रवार को पाली पहुंची। टीम सदस्यों ने किसानों से मुलाकात कर गांवों का किया दौरा, किसानों का आरोप, जितनी मुआवजा राशि थी उसमें से आधी ही मिली।
13 हजार 700 की लिमिट राशि को किया 1 लाख 37 हजार रुपए मामले में पीसीसीबी बैंक की ओर से काफी अनियमितताएं बरती गई हैं। बैंक अधिकारियों ने 13 हजार 700 रुपए की लिमिट राशि को 1 लाख 37 हजार कर दिया। जबकि लिमिट पहले से 13 हजार की थी और इस पर ब्याज भी नहीं था। इसके बाद इस राशि को वसूलने के भी आदेश दिए गए।