चुनाव खाने के मुद्दे पर लड़ा जाएगा, \"अब की बार, स्वल्पाहार\'।
शुरू-शुरू में नेता सही थे, वो चाहते थे गरीब भी समाज में बराबरी पर आ जाएं। और गरीबी ख़त्म हो जाए। बाद के नेताओं ने गरीबी शब्द की जगह जाने क्या सुन लिया और उनका पूरा फोकस गरीबों के घर का खाना ख़त्म करने पर शिफ्ट हो गया। जाने ये भ्रांति नेताओं के मन में कैसे बैठे गई कि गरीब के दिल का रास्ता पेट से होकर गुजरता है। एक बार ये मान भी लेते लेकिन नेताओं को ये लगता है कि वो पेट भी उस गरीब का नहीं उनका खुद का होना चाहिए। इसीलिए आज भी जिसे गरीब की फ़िक्र होती है, वो गरीबों के घर खाने चल देता है।
ये बात लाख सोचने पर भी मेरे पल्ले नहीं पड़ी कि मेरी भलाई करने के नाम पर बीस मुस्टंडे मेरे घर में घुस आएं, मेरे घर का खाना खा जाएं, इसमें मेरा उद्धार कैसे हो रहा है? इस हिसाब से अंग्रेजों ने जब सैकड़ों सालों तक भारत को लूटा तो बेसिकली वो हमारा उद्धार कर रहे थे। बड़े घोटालों में हजारों करोड़ गटक जाने वाले मूलत: उद्धारक कहे जाने चाहिए। तब तो साल के सबसे बड़े उद्धारक का अवॉर्ड भी नीरव मोदी को दे देना चाहिए। अब मुझे चढ़ावे का कॉन्सेप्ट समझ आ रहा है, ऊपर वाले को कुछ खिलाया जाता था, ताकि वो हमारा खाकर हमारा ही उद्धार कर दे,राजनीति ने ही धर्म का मर्म जाना है।
उपवास फैशन में है, बकवास के बाद ये दूसरी चीज है, जिसे करने को नेता इतने उत्साहित दिख रहे हैं। नेता आजकल गरीब आदमी के लिए उपवास रख रहे हैं। ये ऐसा ही है कि मेरे दोस्त की टांग में फ्रैक्चर हो तो मैं लंगड़ा कर चलने लग जाऊं। इसे तो चिढ़ाना कहते हैं ना? गरीब आदमी के लिए भूखा रहना, उसे ट्रोल करने जैसा है। दूसरे पाले के नेता और आगे निकल गए, वो संसद न चलने पर उपवास कर रहे हैं। ये बिल्कुल ऐसा है, मानो ये कहना कि मेरी बात न मानी गई तो मैं खाना खाना छोड़ दूंगा। राजनीति में कब ब्लैकमनी की जगह इमोशनल ब्लैकमेलिंग आ गई, हमें पता ही नहीं चला। वैसे नेता संसद के मामले में हमेशा से बचपना करते आए हैं, उनके मन की नहीं होती तो ऐसे वॉक आउट कर जाते हैं, जैसे 16 साल के लड़के हफ्ते में 3 बार घर छोड़ दिया करते हैं।
उपवास करने के पहले कुछ नेताओं के छोले-भटूरे खाती तस्वीरें आ गईं। देखकर अच्छा लगा, नेता मिल-बांटकर खा रहे थे। प्रधानमंत्री चाहते थे कि पकौड़े खाए जाएं, लेकिन विपक्ष वो क्यों करे जो प्रधानमंत्री कहते हैं? विपक्ष भटूरे वालों को रोजगार दे रही थी। मुझे याद आता है, आजादी के पहले ऐसे पूर्ण बहिष्कार हुआ करते थे। कांग्रेसी नेता वो कपड़े तक नहीं पहनते थे, जो अंग्रेज बनाते थे। अब कांग्रेसी वो पकौड़े नहीं खाते जो प्रधानमंत्री कह दें। अगला चुनाव खाने के मुद्दे पर लड़ा जाएगा, नारा होगा \\\"अब की बार, स्वल्पाहार\\\'। इस सबके बाद अचानक भटूरों में मुझे गांधी जी का चरखा नज़र आने लगा है। पूर्ण बहिष्कार का प्रतीक। भटूरों में तेल बहुत होता है, तेल का लालची अमेरिका भटूरे देखकर जलता होगा। इतने तेल के लिए तो वो देशों पर हमला कर दिया करता है, उतना ही तेल यहां प्लेट में नज़र आ रहा है। इसी आड़े विपक्ष आम आदमी को सांत्वना भी दे रहा है। डीजल-पेट्रोल के दाम रोज़ बढ़ते हैं तो क्या हुआ, खाने का तेल आज भी अफोर्डेबल है।
तमाम पार्टियां उपवास करके डरा रही हैं। अन्ना उपवास करते हैं तो डरे रहते हैं नई पार्टी न बन जाए। पार्टियों को उपवास जारी रखने चाहिए, उपवास को व्रत कहना चाहिए और प्रवक्ताओं से मौन व्रत कराना चाहिए। भई टीवी पर दिमाग खाना भी तो खाने में ही आता है, लेकिन सबसे जरूरी बात ये कि उपवास के पहले खाने की टेबल पर फोन बंद करा देना चाहिए। इससे भटूरों की तस्वीरें और नहीं आएंगी और नियम कुछ ऐसा हो कि जिसके हाथ में मोबाइल दिखा उसका उपवास भंग माना जाएगा।

सालों पहले विजय माल्या से जमानत के टिप्स लेते हुए सलमान खान की दुर्लभ तस्वीर...
हर हफ्ते एक प्रसिद्ध नाम, जिसके चेहरे पर समाया होगा उसका काम।
मार्क जकरबर्ग
फेसबुक के सीईओ मार्क जकरबर्ग ने कहा है कि फेसबुक उनका भी डेटा लेता है, जो उसके यूजर नहीं है, लेकिन इंटरनेट इस्तेमाल करते हैं। यानी डेटा लीक का संकट सभी यूजर्स पर है।
इलस्ट्रेशन- कुमार

अफवाह
पीएम मोदी ने कहा है कि बिहार में 1 हफ्ते में 8.5 लाख टॉयलेट बनाए गए हैं, और ये बयान तब आया है जब बिहार में शराब पूरी तरह बैन है।
बीजेपी की कमाई 81 फीसदी बढ़ गई है, दरअसल बढ़ी तो 100 फीसदी थी लेकिन उसमें से 18 फीसदी जीएसटी+.5 फीसदी कृषि सेस +.5 फीसदी स्वच्छ भारत सेस काट दिया गया है।
शिवराज सरकार ने कंप्यूटर बाबा को राज्यमंत्री बनाया है। चलो RAM के नाम पर कुछ काम तो किया है।
वेस्ट इंडीज़ खिलाड़ियों के बिना इंडियन प्रीमियर लीग ठीक वैसी ही है, जैसे बिना ऐक्शन के साउथ इंडियन मूवीज।
मुझे पता होता कि बिहार में हर हफ़्ते 8.5 लाख टॉयलेट बनते हैं तो मैं अपनी फिल्म वहीं शूट करता।
पाली
14 अप्रैल
2018

मुझे खुद भी ये बात उसी दिन पता चली थी।
उपवास करने के पहले कुछ नेताओं के छोले-भटूरे खाती तस्वीरें आ गईं। देखकर अच्छा लगा, नेता मिल-बांटकर खा रहे थे। हालांकि कोई पकौड़े नहीं खा रहा था।
सौरभ मिश्रा/अफवाह
हार्दिक- चलो मुझ पर भी किसी ने स्याही फेंक दी। हो सकता है अब मैं भी दिल्ली का मुख्यमंत्री बन जाऊं।
यार कांग्रेस ने 60 सालों में कुछ नहीं किया है।
देश में पहली बार पूर्णत: मौलिक एवं अप्रसारित
हास्य-व्यंग्य-कटाक्ष पर पेज सिर्फ भास्कर में...

1. गणित के अध्यापक को पैसे के मामले में सबसे सख्त क्यों माना जाता है? जवाब क्योंकि वो π-π का हिसाब लेता है।
2. आदमी ठंड में कहीं जाता और नहाता क्यों नहीं है? जवाब फ़ॉग चल रहा होता है।
3. बच्चे गर्मी की छुट्टी में नाना के घर जाते हैं, तो फलों के बच्चे कहाँं जाते हैं..? जवाब बनाना के घर।
4. लोग क्यों कहते हैं कि चींटियों को वास्तविकता का एहसास नहीं होता? जवाब क्योंकि वो मिट्टी के महल बनाते रहती हैं।
...डेटा लीक।
हां, मुझे तो सब पता है।
अमित तिवारी
व्यंग्य
वरुण धवन की फ़िल्म \\\"अक्टूबर\\\' रिलीज़ हुई है।
-भाजपाई चाहें तो कह सकते हैं कि मई में अक्टूबर लाने वाले मोदीजी पहले प्रधानमंत्री हैं।

मोदीजी ने अपने सारे सांसदों और विधायकों के साथ उपवास रखा।
-सेल्फी लेने के सिवा इनके सारे आइडिया कांग्रेस वाले ही हैं।

मोदीजी ने कहा है कि बिहार में 1 हफ्ते में 8,50,000 टॉयलेट बनाए गए हैं।
-पता नहीं चल रहा कि फेंकने की रफ्तार ज्यादा है या टॉयलेट बनवाने की।

श्रीलंका, नेपाल, म्यांमार के बाद अब ईरान भी चीन का रुख़ कर रहा है।
-मोदीजी की विदेश नीति सिर्फ़ मीम्स के लिए फोटो दिलाने के लायक ही बची है।

कांग्रेसियों ने 2 घण्टे का उपवास रखा था।
-ज्यादा खाने की आदत के हिसाब से तो ये खतरनाक स्टंट था।

राहुल गांधी ने दलितों के लिए सांकेतिक उपवास रखा था।
-अब समझ आया कि इनको हमेशा सांकेतिक वोट मिलने की वजह क्या है।

उज्जैन में हार्दिक पटेल पर स्याही फेंकी गई है।
-बाहरी रहा होगा, मप्र का होता तो पोहा-जलेबी फेंकता।

रक्षा और कई अन्य मंत्रालयों की वेबसाइट हैक हो गई।
-और आधार इतना सेफ है कि किसी और का कार्ड छुओ तो करंट मार देता है।
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