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रमजान की फ़ज़ीलत : माहे रमजान सभी महीनों से अफजल

3 वर्ष पहले
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रमजानुल मुबारक का महीना साल के सभी महीनों में अफजल है। इस माह को अगर हम नेकियों की सीजन कहें तो गलत नहीं है। ये अल्लाह-तआला का कितना बड़ा अहसान व करम है कि रमजानुल मुबारक में तमाम नफली नमाजों का दरजा फर्ज नमाजों के बराबर कर किया जाता है। सदका व खैरात का सवाब (पुण्य) कई गुना बढ़ा दिया जाता है। रोजा एक सालाना तर्बीयती कोर्स है, जिसके जरिए आदमी पर भूख के हालात पैदा हो जाते हैं। गरीबों की भलाई करना और अल्लाह तआला ने रमजान का महीना मुसलमानों को अताकर के रोजा रखने का हुक्म इसलिए दिया कि मेरे बंदे दिनभर भूखे-प्यासे रहेंगे तो उन्हें गरीबों की भूख और प्यास का अहसास होगा और वे गरीबों का ख्याल रखेंगे। ताकि उसके अंदर आजीजी व इन्किसारी और अल्लाह से दुआ व तौबा की कैफियत उभरे हमारा रब हमें भूखा नहीं रखना चाहता, बल्कि वह तो हमारे अंदर तकवा व परहेजगारी पैदा फरमाकर हमारे अंदर छुपे इंसानियत के जौहर को उजागर (दिखाना) करना चाहता है। रमजान के पहले अशरे से ही सभी मस्जिदें मोमीन बंदों से आबाद हैं। हर मोमीन अपनी निजात की फिक्र में नजर आ रहा है। मोमीन रोजे रख कर नमाजों में सज्दे में सर रखकर अल्लाह से अपने गुनाहों की माफी मांग रहा है, इसलिए कहा गया है कि रमजानुल मुबारक का महीना सभी महीनों अफजल है। हवाला-मुस्लिम शरीफ

- मौलाना इदरीस रज़ा नक्शबंदी, पेश इमाम, मस्जिद ए फातिमा, धर्मपुरा दरगाह, पाली

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