पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें
  • Hindi News
  • National
  • नगर परिषद के पट्टे झूठे, जनप्रतिनिधियों की शह पर हुए अतिक्रमण असली

नगर परिषद के पट्टे झूठे, जनप्रतिनिधियों की शह पर हुए अतिक्रमण असली

3 वर्ष पहले
  • कॉपी लिंक
नगर परिषद ने 31 साल पहले नया गांव के पास जगदम्बा कॉलोनी बसाई थी। यहां 126 आवेदकों में से रुपए जमा करवाने वाले 89 लोगों को लॉटरी के आधार पर भूखंड आवंटित कर पट्टे जारी किए थे। लेकिन इन्हें आज तक मौके पर कब्जा नहीं दिया गया। नगर परिषद अब इसी कॉलोनी में अतिक्रमण कर बसे लोगों को कच्ची बस्ती योजना में शामिल कर पट्टे देने जा रही है। इसका प्रस्ताव 18 मई को होने वाली बोर्ड बैठक के एजेंडे में शामिल किया है। हैरत की बात यह कि नगर परिषद 31 साल में न तो अपनी ही बसाई योजना से अतिक्रमण हटा सकी और न ही जिन्हें पट्टे दिए उन्हें कहीं ओर बसा सकी। इन पट्टेधारकों की राशि अब तक नगर परिषद में जमा है।

जानकारी के अनुसार नगर परिषद ने आर्थिक दृष्टि से पिछड़े वर्ग के परिवारों को भूखंड उपलब्ध कराने के लिए साइट एवं सर्विस योजना के तहत पाली शहर के नया गांव के पास आवासीय योजना बनाकर गत 18 मार्च 1987 को लॉटरी पद्धति से 126 व्यक्तियों को 13 गुणा 35 फीट माप के भूखंड आवंटित कर अनुज्ञा पत्र जारी किए गए थे। इन आवंटियों को भौतिक कब्जा देने से पूर्व ही अन्य व्यक्तियों द्वारा कई भूखंडों को सम्मिलित करते हुए अनधिकृत रूप से अतिक्रमण कर पक्के निर्माण कर लिए गए। इस कारण मूल आवंटी को भौतिक कब्जा नहीं दिया गया।

नगर परिषद की योजना में रुपए जमा करवाकर पट्टे लेने के बावजूद 31 साल से दर-दर घूम रहे 89 परिवार, लेकिन नगर परिषद उनके लिए भी अतिक्रमण नहीं हटा सकी, विधानसभा में सरकार वहां बसे लोगों को नियमित करने से मना कर चुकी, लेकिन अब करेंगे नियमित

31 साल पहले भले ही 750 रुपए में भूखंड आवंटित हुए लेकिन मौके पर अब लाखों के, पट्टे होने के बावजूद नगर परिषद उन्हें अब शहर से कहीं दूर बसाएगी, लेकिन अतिक्रमण कर बैठे लोगों को बेशकीमती भूखंड देकर नगर परिषद देगी ईनाम

31 साल पहले परिषद ने बनाई थी जगदंबा कॉलोनी, रुपए लिए-पट्टे दिए लेकिन कब्जा आज तक नहीं

आर्थिक दृष्टि से कमजोर परिवारों को भूखंड उपलब्ध कराने के लिए साइट एवं सर्विस योजना के तहत पाली शहर के नया गांव के पास आवासीय योजना बनाकर गत 18 मार्च 1987 को लॉटरी पद्धति से 126 व्यक्तियों को 13 गुणा 35 फीट माप के भूखंड आवंटित कर अनुज्ञा पत्र जारी किया। 126 में से 89 लोगाें ने नगर परिषद में प्रति 50 वर्गगज जमीन के लिए 750 रुपए जमा करवाए। पट्टे लेकर ये लोग मौके पर पहुंचे तो वहां पहले से ही लोगों ने अतिक्रमण कर रखा था। इसके बाद ये लगातार नगर परिषद से उन्हें हटाने और आवंटित भूखंड पर कब्जा लेने की गुहार करते रहे। लेकिन उन्हें आज तक न तो भूखंड मिल पाए हैं और न ही मामला सुलझ पाया है।

विधानसभा में उठा था मामला, सरकार ने गठित की जांच कमेटी, अब तक रिपोर्ट नहीं

बंजारा समेत अन्य समाज के लोग वर्ष 1980 से जोगमाया की ढाणी में बसे हुए हैं। तत्कालीन बोर्ड व पूर्व अधिकारियों ने 1987 में सर्वे किए बगैर ही कॉलोनी काटकर भूखंड लोगों को भूखंड आवंटन कर दिए, जबकि उस समय कई जगहों नगर परिषद खाली जमीन पड़ी थी। तत्कालीन बोर्ड ने हमें नजर अंदाज कर ऐसा किया था। वर्तमान में पक्के मकान बनाने के साथ लोगों के राशन कार्ड व अन्य दस्तावेज भी इसी कॉलोनी के नाम से बने हुए हैं। -अशोक बंजारा, स्थानीय पार्षद

जगदम्बा कॉलोनी में भूखंड आवंटित करने के बावजूद भी भूखंड मालिकों को कब्जा नहीं देने का मामला विधायक ज्ञानचंद पारख ने विधानसभा में उठाया था। स्वायत्त शासन मंत्री श्रीचंद कृपलानी ने मौके पर कब्जा कर बैठे लोगों के नियमन की बात यह कहते हुए खारिज की थी कि यह सरकार की योजना है, इसे कच्ची बस्ती नहीं माना जा सकता। कलेक्टर की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन कर प्राप्त रिपोर्ट का परीक्षण करने के बाद मामले का निस्तारण करने के निर्देश दिए थे। अब तक कमेटी की रिपोर्ट भी नहीं मिली और परिषद ने एजेंडे में शामिल कर लिया।

यह कॉलोनी कच्ची बस्ती कैसे‌‌? जिम्मेदारों ने सिर्फ अतिक्रमण को ही शह नहीं दिया बल्कि यहां सीसी सड़क से लेकर तमाम सुविधाएं भी उपलब्ध करवाई।

जगदम्बा कॉलोनी के मामले में कलेक्टर की अध्यक्षता में गठित कमेटी ने अपनी राय सौंप दी है। पूर्व में भूखंड आवंटन धारकों में से 89 में से 72 लोगों की राशि जमा है। बोर्ड की बैठक में कच्ची बस्ती नियमन के तहत पहले से बसे लोगों को पट्टे जारी कर सकती है। इसके लिए सर्वे भी करवाया गया है कि वर्ष 1987 से पूर्व वहां कौन-कौन बसे हुए हैं। रही बात जगदम्बा कॉलोनी में वर्ष 1987 में भूखंड धारकों को कब्जा दिलाने की तो नगर परिषद की नई आवासीय कॉलोनी में उन्हें कब्जा दिलाया जा सकता है। -इंद्रसिंह राठौड़, आयुक्त नगर परिषद पाली

भास्कर विचार

संभव है बहुमत के आधार पर नगर परिषद में यह प्रस्ताव पारित हो जाए, लेकिन जिम्मेदार सोचें कि क्या यह उनकी असफलता पर मुहर नहीं ?

हर बोर्ड बैठक में हंगामा और उसके बाद बहुमत के आधार पर नगर परिषद वह सब प्रस्ताव पारित मान लेती है जिन्हें वह एजेंडे में शामिल करती है। गलत भी तो सही भी। संभव है यह प्रस्ताव भी पारित हो जाए। लेकिन जिम्मेदार इस प्रस्ताव को पारित करवाकर अपनी ही असफलता पर मुहर लगवा लेंगे यह भी तय है। नगर परिषद अपनी ही जमीन से अतिक्रमण नहीं हटवा पाई तो शहरवासी फिर अपनी जमीन-मकानों पर हो रहे कब्जे हटवाने की उम्मीद किस से करेंगे। अतिक्रमण 1 दिन पुराना हो, 31 साल या फिर इससे भी ज्यादा दिनों का। कहलाएगा अतिक्रमण ही। यह भी तय है कि जनप्रतिनिधियों की शह और संरक्षण में ही ये हाेते हैं। और फिर मजबूरी बताकर इन्हें नियमित करने की राह खुलवाई जाती है।

जवाब दें जिम्मेदार - मुख्यमंत्री आवास योजना में बने आवास खाली, वहां भी तो शिफ्ट किया जा सकता है

मानवीय संवेदनाएं जरूरी है। जगदंबा नगर में भी इसी आधार पर जनप्रतिनिधि कच्ची बस्ती मानकर उन्हें नियमित करने जा रहे हैं। एक तरफ कमजोर व गरीब तबके के लिए ही यूआईटी व नगर परिषद द्वारा बनवाए जा रहे मुख्यमंत्री आवास योजना के बड़ी संख्या में आवास खाली हैं। जितने आवास बने, उतने आवेदन तक नहीं आ रहे। कच्ची बस्तियां बढ़ाने के बजाय जिम्मेदार गरीब व कमजोर लोगों को वहां आवास क्यों नहीं उपलब्ध करवाते।

खबरें और भी हैं...