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निमाज कस्बे में करोड़ों की हो गई सात बीघा जमीन, भू-तस्करों ने अधिकारियों से मिलकर 1 बीघा दर्ज करवा दी

3 वर्ष पहले
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जिले की सबसे बड़ी ग्राम पंचायत निमाज में करोड़ों रुपए की जमीन पर भू-तस्करों की नजर लग गई है। बरसों से 7 बीघा से अधिक जमीन को इन लोगों ने राजस्व अधिकारियों से मिलकर राजस्व रिकॉर्ड में 1 बीघा करवाकर ग्राम पंचायत से पट्टे भी जारी करवा दिए। चौंकाने वाली यह है कि नियमानुसार खातेदारी जमीन को आबादी में दर्ज कराने के लिए कलेक्टर से आदेश पर ही जमीन की किस्म बदल सकती है। साथ ही तहसीलदार डीएलसी रेट तय करता है। पीड़ित पक्षकार मंगलवार को एसपी से मिला। एसपी राहुल प्रकाश ने मामले की जांच के आदेश दिए हैं। पीड़ित पक्षकार की तरफ से सौंपे गए ज्ञापन में बताया कि ग्राम की आबादी भूमि से सटा हुए खसरा नंबर 1677 की साढ़े सात बीघा भूमि में से छह बीघा भूमि को आबादी में सम्मिलित किए जाने का इंद्राज लाल स्याही से पुरानी जमाबंदी में किया गया है। लेकिन इस छह बीघा भूमि को न तो नक्शे में आबादी में सम्मिलित किया गया है और न ही किसी अन्य दस्तावेज में। वर्तमान में खसरा संख्या 1677 की 1 बीघा 13 बिस्वा भूमि निमाज निवासी डगलाराम रमेशचंद, नेमीचंद, मूलचंद सहित इसी परिवार के अन्य लोगों के नाम दर्ज है। लेकिन शेष करीब छह बीघा भूमि का कहीं इंद्राज नहीं है। आबादी में शामिल की गई इस छह बीघा भूमि का इंद्राज आबादी भूमि निमाज के नाम से दर्ज होना चाहिए था। राजस्व रिकॉर्ड में ऐसा कुछ नहीं है। निमाज ग्राम की आबादी एवं खातेदारी भूमि के नक्शों में भी इस छह बीघा भूमि को आबादी में जोड़ने के संबंध में कोई इंद्राज नहीं किया गया है।

मामला पुलिस में पहुंचा, पीड़ित पक्षकार मंगलवार को एसपी राहुल प्रकाश से मिला

इस तरह से समझिए किस तरह से हुआ गड़बड़झाला

1. बिना मिसल खोले 7. 13 बीघा जमीन को राजस्व अधिकारियों ने रिकॉर्ड में दर्ज किया 1.13 बीघा

2. ग्राम पंचायत ने पट्टा संख्या-4 में 18, 265 वर्गगज का पट्टा जारी करवा दिया

नियम यह- ग्राम पंचायत अपने स्तर पर आबादी भूमि दर्ज नहीं कर सकती

1. खातेदारी भूमि को सीधे ही आबादी में दर्ज नहीं किया जा सकता

2. खातेदारी भूमि को पहले सिवाय चक में दर्ज करना पड़ता है

3.कलेक्टर के आदेश से ही जमीन की किस्म में परिवर्तन संभव है

4. 21 वर्ष पुराने का कब्जा मानकर डीएलसी रेट तहसीलदार तय करता है

5. जमीन का कब्जा भी ग्राम पंचायत के पास नहीं था

बड़ा सवाल

जिस भूमि को आबादी में सम्मिलित दर्शाकर पंद्रह लोगों को छह बीघा भूमि का मालिक बनाया गया है, उसका सिर्फ जमाबंदी रजिस्टर में इंद्राज कर बाकी जरूरी खानापूर्ति बकाया कैसे छोड़ी जा सकती है, जबकि राजस्व नियमों के अनुसार किसी भी जमीन को आबादी में सम्मिलित करने के लिए लंबी खानापूर्ति पूरी करनी पड़ती है।

पीड़ित परिवार का यह है दावा- जमीन उनके पास ही, वे ही काश्त कर रहे

60 साल पुराने पट्टे के आधार पर अब खेत में कब्जा कर रहे पट्टाधारियों के वंशज

वर्तमान में खसरा संख्या 1677 की 1 बीघा 13 बिस्वा भूमि निमाज निवासी डगलाराम रमेशचंद, नेमीचंद, मूलचंद सहित इसी परिवार के अन्य लोगों के नाम दर्ज है। लेकिन शेष करीब छह बीघा भूमि का कहीं इंद्राज नहीं है।

ग्राम की आबादी भूमि से सटा हुए खसरा नंबर 1677 की साढ़े सात बीघा भूमि में से छह बीघा भूमि को आबादी में सम्मिलित किए जाने का इंद्राज लाल स्याही से पुरानी जमाबंदी में किया गया।

जिस भूमि को आबादी में सम्मिलित दर्शाकर पंद्रह लोगों को छह बीघा भूमि का मालिक बनाया गया है, उसका सिर्फ जमाबंदी रजिस्टर में इंद्राज कर बाकी जरूरी खानापूर्ति बकाया कैसे छोड़ी जा सकती है।

निशुल्क आवंटन के जरिए दिया दिया है पट्टा

जिन पंद्रह लोगों को छह बीघा का पट्टा दिया गया है, उन लोगों को भूमि का मूल्य शून्य मानते हुए निशुल्क पट्टा जारी किया गया है। अलग-अलग जाति एवं परिवारों के इन सदस्यों को एक पट्टा जारी करना भी बड़े सवाल उठाता है। एक ही परिवार के सदस्यों को किसी भूमि का एक पट्टा जारी किया जाना तो आम बात है, लेकिन अलग-अलग परिवारों के लोगों को एक पट्टा जारी किया जाना बड़े सवाल खड़े करता है। जिस पट्टे में इन पंद्रह लोगों को इस जमीन का मालिक बनाया गया है उस पट्टे में इन सभी लोगों द्वारा जमीन के किस हिस्से पर कब्जा किया जाएगा, इसका स्पष्ट उल्लेख ही नहीं है। न ही किस व्यक्ति के हिस्से में कितनी भूमि आएगी इसका उल्लेख भी नहीं किया गया है। पूरी छह बीघा भूमि में से जमीन के किस हिस्से पर किसका अधिकार होगा इसका स्पष्ट वर्णन ही पट्टे में नहीं है।

ग्राम पंचायत से लेकर जोधपुर तक कहीं नहीं है रिकॉर्ड

ग्राम पंचायत द्वारा जारी किए जाने वाले आबादी भूमि के विक्रय विलेख अथवा पट्टे को जारी करने से पहले उस जमीन और पट्टा धारक से जुड़ी संपूर्ण जानकारी शामिल कर उसे दस्तावेजी रूप दिया जाकर पट्टे की मिसल तैयार की जाती है। जिस व्यक्ति की जमीन पर यह पट्टा जारी किया गया है, उसके द्वारा ग्राम पंचायत कार्यालय से इस संबंध में मिसल की जानकारी मांगी गई। लेकिन ग्राम पंचायत ने इससे जुड़ा किसी तरह का रिकार्ड उपलब्ध नहीं होने का लिखित जवाब प्रार्थी को उपलब्ध करवाया। प्रार्थी द्वारा पाली एवं जोधपुर में राजस्व एवं पंचायतीराज रिकार्ड से जुडे सरकारी कार्यालयों से भी जानकारी उपलब्ध करवाने की मांग की गई, लेकिन उन सभी स्थानों से भी उन्हें इस पट्टे से जुड़ा किसी तरह का रिकार्ड उपलब्ध नहीं होने का जवाब मिला। एेसे में इस पट्टे की वैद्यता को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं।

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