बैसाखी विदेशी शासकों के आतंक के खिलाफ संघर्ष का सूचक: वीरेंद्र
पंचकूला|बैसाखी का पावन दिन भारतीय समाज के लिए महज नए अनाज के आगमन की सालाना तारीख या पर्व नहीं है। इस दिन का संबंध विदेशी शासकों के आतंक और अत्याचार के खिलाफ हमारे महान पूर्वजों के संघर्ष से भी है। दशमेश पिता गुरु गोबिंद सिंह ने इसी दिन श्री आनंदपुर साहिब में खालसा सजाया था और इसी दिन 1919 में जलियांवाला बाग में जालिम अंग्रेजों ने हमारे हजारों निहत्थे पूर्वजों का लहू बेरहमी के साथ बहाया था। यह बात सेक्टर 14 हरियाणा साहित्य अकादमी में आयोजित विचार गोष्ठी में हरियाणा ग्रंथ अकादमी के उपाध्यक्ष व निदेशक प्रो. वीरेंद्र सिंह चौहान ने कही। सेवानिवृत्त प्राचार्य डॉक्टर वीपी नागपाल द्वारा रचित ‘पंचकूला के प्रकाश स्तंभ’ नामक पुस्तक पर चर्चा के लिए आयोजित इस संवाद में इतिहासकार एमएम जुनेजा ने पुस्तक की समीक्षा की। हरियाणा ग्रंथ अकादमी और एहसास अदबी सोसायटी के इस संयुक्त आयोजन की अध्यक्षता सोसायटी के अध्यक्ष और जाने माने साहित्यकार बीडी कालिया हमदम ने की। चौहान ने कहा कि गुरु गोबिंद सिंह ने आज ही के दिन अगर मुगलिया आतंकवाद के खिलाफ खालसा न सजाया होता तो आज का भारत और उसका समाज उसके वर्तमान स्वरूप में नहीं होता।