बैसाखी पर्व पर दिया समानता का संदेश
शहर में विभिन्न स्थानों पर बैसाखी का पर्व मनाते हुए भेदभाव को खत्म कर समानता का संदेश दिया। डेरा बाबा जोध सचियार में बाबा जोध की पावन स्मृति में सालाना सत्संग एवं बैसाखी पर्व मनाया गया।
गुरुद्वारे को रंग-बिरंगी रोशनी से सजाया गया। हजूरी रागी बीबी श्याम कौर, बीबी परमजीत कौर ने परमात्मा से जुड़े रहने की शिक्षा दी। इसके साथ ही रात को सजाए गए दीवान में गुरमत विचारक भाई राजिंद्र र|, सरदार महिंद्र सिंह, भाई गौरव भ्याना ने सेवा सिमरन में रहने का आह्वान किया। रागी जत्थों ने बताया कि बाबा जोध का जन्म 1590 में लायलपुर जिले के कोट कमालिया में हुआ था।
उन्होंने छठी पातशाही गुरु हरगोबिंद सिंह से लेकर दसवीं पातशाही गुरु गोबिंद सिंह तक सच्ची सेवा की। इस कारण सिखों के दसवें गुरु गोबिंद सिंह ने उन्हें सचियार की पदवी दी। उनका डेरा मखदूमपुरा नाम से प्रसिद्ध हुआ। सत्संग के दौरान गुरुद्वारे के आसपास मेले जैसा माहौल था। संगतों ने निशानी के तौर पर खरीदारी की। प्रधान गोपाल दास ने बताया कि हर साल बाबा जोध की याद में यह सत्संग किया जाता है। इस अवसर पर प्रधान सुनील कुमार भ्याना, सरजीत सिंह, सोमनाथ भ्याना, नरेंद्र भ्याना, राकेश भ्याना व जयपाल भ्याना मौजूद रहे।
गुरुद्वारा श्री गुरु रामदास सिंह सभा मॉडल टाउन में विशेष रूप से दिल्ली से पहुंचे भाई लवजीत सिंह ने संगतों को गुरुबाणी से निहाल किया। शबद कीर्तन के दौरान उन्होंने कहा कि धर्म की रक्षा के लिए गुरु गोबिंद सिंह ने बैसाखी के दिन खालसा पंथ की नींव रखी थी। इसलिए इसे खालसा साजना दिवस भी कहा जाता है। पांच प्यारे बनाकर उन्हें गुरु का दर्जा देकर स्वयं उनके शिष्य बने और कहा-जहां पांच सिख इकट्ठे होंगे, वहीं मैं निवास करूंगा।
गुरु गोबिंद सिंह ने सभी जातियों में भेदभाव को खत्म कर समानता का संदेश दिया। सभा के सरदार मोहनजीत सिंह ने बताया कि गुरुद्वारा सभा की ओर से स्कूल भी चलाया जा रहा है जिसमें गरीबों को नि:शुल्क शिक्षा दी जाती है। अंत में गुरु के लंगर से सभी संगतों ने प्रसाद ग्रहण किया।