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कपड़ा बाजार में रमजान एवं यूनिफाॅर्म की मांग, सूरत की मिलें वृद्धि के पक्ष में

3 वर्ष पहले
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कपड़ा बाजार में रमजान की ग्राहकी कुर्ता-पायजामा और कॉटन सलवार सूट्स में शुरू हो गई है। आने वाले दिनों में ग्राहकी का जोर बढ़ता जाएगा। इस पर कैसी ग्राहकी निकलती है, यह देखना है। यूनिफाॅर्म के कपड़ों की मांग है। अगले माह से रिटेल में रेडीमेड निर्माताओं के यहां ग्राहकी चलना शुरू हो जाएगी। सूरत की कपड़ा मिलें कच्चा माल एवं मजदूरी बढ़ने की वजह से 1 से 3 रुपए मीटर भाव बढ़ाना चाहते हैं, जबकि कमजोर ग्राहकी की वजह से व्यापारी भाव वृद्धि का विरोध कर रहे हैं। चीन में रंग-रसायन बनाने वाली कंपनियों को प्रदूषण विभाग ने शहरों से दूर जाने को कहने से कच्चे माल का विश्वव्यापी संकट पैदा हो गया है। सूरत की कपड़ा मिलों ने जयपुर-कोलकाता जैसी प्योर दिखने वाली साड़ियां बनाकर दोनों शहरों के कारोबार को प्रभावित किया है।

कॉटन सलवार सूट्स

म.तु. क्लाथ मार्केट में रमजान की ग्राहकी शुरू हो गई है। कॉटन सलवार सूट्स जैतपुर, सूरत और अहमदाबाद से आ रहे हैं। जैतपुर के मिश्री क्रिएशन, पाटीदार मिल्स, बाला कॉटन एवं सूरत ज्योति की मिल के सलवार सूट्स 300 से 600 रुपए 4 कलर वाले मैचिंग सूट्स वर्कवाले 200 से 500 रुपए की रेंज में आ रहे हैं। जयपुर और अहमदाबाद से तैयार कॉटन कुर्तियां प्रत्येक साइज में 160 से 600 रुपए की रेंज में आ रही है। इसके अलावा लेगिंग का चलन भी बढ़ने लगा है। कपड़ा बाजार में प्रिंटेड सिंथेटिक साड़ियों के केटलॉक में अनेक प्रसिद्ध कंपनियों के 6 से 16 पीस में आ गए हैं। बाजार में मांग भी अच्छी बनी हुई है। गार्डन सिल्क मिल्स ने प्रतिवर्षानुसार इस वर्ष भी इंदौर में सेल लगाई है। इस छूट का लाभ राजानी भवन स्थित मिल के शोरूम रिवोली पर भी दिया जा रहा है।

हलके कपड़े की थैलियां

मुंबई में सूती रेडीमेड कपड़ों में रमजान की ग्राहकी बढ़ती जा रही है। ऐसी आशा है कि ईद के अवसर पर कपड़ा बाजार में जोरदार ग्राहकी निकल सकती है। ब्याह-शादियों के दिन नहीं होने से व्यापारियों में निराशा का माहौल है। मप्र के साथ राजस्थान में गर्मी तेज पड़े से खेरची हो या थोक ग्राहकी घरों से बाहर नहीं निकल रहे हैं। यूनिफाॅर्म निर्माताओं की खरीदी चल रही है। स्कूल यूनिफाॅर्म में भीलवाड़ा की अनेक मिलों का अपना वर्चस्व है। कुछ मिलों का यूनिफाॅर्म का कपड़ा नाम से एवं अपने भाव से बिकता है। मुंबई के व्यापारियों में रमजान की वजह से नए उत्साह का संचार हुआ है। देखना यह है कि ईद की ग्राहकी रेडीमेड में कैसी चलती है। महाराष्ट्र में प्लास्टिक की थैलियों के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने की वजह से ग्रे कॉटन हलके कपड़े की थैलियों में अच्छी मांग है। दूसरी ओर कोलकाता दुर्गा पूजा के लिए सेंपलिंग का कार्य शुरू हो गया है। डेनिम में 4-5 रुपए प्रति मीटर भाव बढ़ गए हैं।

व्यापार में सुधार

कपड़े का व्यापार भी जीएसटी की फेर में आ गया है। ई-वे बिल लागू होने से मप्र के बाजार का 50 प्रतिशत व्यापार पूरी तरह से सुधर गया है। कुछ ट्रांसपोर्ट कंपनियां एवं लक्जरी बसों से अभी भी बिना बिल का कपड़ा आ रहा है, जिस पर संबंधित जांचकर्ताओं को पकड़ बनाना चाहिए, जिससे व्यापार और अधिक साफ-सुथरा हो जाएगा। यह सही है कि करों की बचत करने के लिए व्यापारी कोई न कोई गली निकाल लेते हैं। कुछ व्यापारी 25 से 50 प्रतिशत अंडरबिलिंग में माल मंगवा रहे हैं। ऐसे व्यापारियों की लागत कम बैठती है। बाजार में कम भाव पर कपड़ा बेचने में सक्षम हो जाते हैं। यह भी सही है कि ई-वे बिल के जांचकर्ताओं द्वारा अंडरबिलिंग को सिद्ध करना न केवल कठिन है वरन असंभव सा है। अत: इस बीमारी को दूर करना कठिन है। देखना यह है कि व्यापारी विक्रेता को शेष अंतर की राशि का भुगतान कैसे करेंगे?

कच्चे माल के भाव बढ़े

सूरत में कपड़ा मिलों और व्यापारियों के बीच कपड़े में भाव वृद्धि को लेकर विवाद की स्थिति बन गई है। मिलों का कहना है कि केमिकल, कोयला, एसीड, कलर केमिकल, श्रमिकों की मजदूरी में 10 से 20 प्रतिशत की वृद्धि हो गई है, जिससे कपड़े के लागत बढ़ गई है। इस वजह से 1 से 3 रुपए मीटर की भाव वृद्धि करना आवश्यक है। इससे पूर्व भी मिलें भाव वृद्धि कर चुकी थी। व्यापारियों का मत है कि वैसे ही बाजारों में ग्राहकी कम है। भाव वृद्धि के बाद ग्राहकी और कमजोर पड़ जाएगी। इसके अलावा आयातित कपड़ों के भाव भी बढ़े हैं। मिलों में श्रमिकों की कमी है। नोटबंदी के बाद बिहार और उप्र के अनेक श्रमिक अपने घर चले गए थे, उनमें से अनेक वापस लौटकर नहीं आए हैं, जिससे कपड़ा उद्योग लंबे समय से श्रमिकों की कमी की समस्या से भी जूझ रहा है।

प्रदूषण विभाग की सख्ती

उल्लेखनीय है कि डाइंग और प्रिंटिंग इकाइयों में उपयोगी विभिन्न तरह के डाइज कलर की शार्टेज बनी हुई है। इस अभाव के पीछे मुख्य वजह यह है कि चीन सरकार द्वारा प्रदूषण फैलाने वाली इकाइयों को शहरी सीमा से 1000-1000 किलोमीटर दूर तक जाने पर मजबूर कर दिया है और कुछ के उत्पादन पर रोक लगा दी है। चीन सरकार की सख्ती से रंग-रसायन उद्योग बुरी तरह से प्रभावित हुई है। चीन में पॉल्यूशन विभाग ने कुछ निश्चित मानकों के तहत कलर-केमिकल जैसे प्रदूषण पोषक उत्पादनों पर भी पाबंदी लगा दी है। कुछ को सुरक्षित जोन में उत्पादन करने को कहा है इस वजह से कपड़ा उद्योग में लगने वाले कच्चे माल की भारी मात्रा में कमी पड़ गई है। शार्टेज का प्रभाव न केवल भारत में वरन पूरे विश्व के अन्य देशों पर भी पड़ेगा। चीन के उत्पादक कई महीनों में आॅर्डर की आपूर्ति नहीं कर पा रहे हैं। नए स्थान पर इकाइयां स्थापित करने में काफी समय लगेगा।

सूरत की कढ़ाई वाली फैंसी साड़ियां

सूरत के उद्योगों ने जयपुर, कोलकाता एवं बेंगलुरू जैसे साड़ियों के लिए देशभर में प्रसिद्ध उद्योग की नींव हिलाकर रख दी है। सूरत में उपरोक्त राज्यों के समान साड़ियां प्रिंट करवा ली और कढ़ाई के कार्य के लिए जयपुर-बनारस भेज देते हैं। सूरत में बनी साड़ियां एकदम जयपुर, कोलकाता जैसे प्योर लगती है। उपरोक्त राज्यों से कीमत भी कम होती है, इससे देशभर सूरत की कढ़ाई वाली फैंसी साड़ियों ने बाजार पर पकड़ बना ली है। सूरत के कपड़ा उद्योग से टेक्सटाइल्स मंत्रालय से मांग की है कि 78 करोड़ रुपए के जो आवंटन मंजूर किए हैं, उनका फंड अभी तक रिलीज नहीं किया हैं। उद्योग ने फंड शीघ्र जारी करने की मांग की। यदि फंड रिलीज हो जाता है, तो मंद पड़े कपड़ा उद्योग में तीव्र विकास की नई उम्मीद पैदा होगी। अभी तक 170 उद्यमी टफ योजना का लाभ ले चुके हैं।

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