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1 जून से हर संस्कार पर बचेगी 7 क्विंटल लकड़ी, 100 फीट ऊंची चिमनी से पर्यावरण रहेगा सेफ

3 वर्ष पहले
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राणा रणधीर/संदीप टुरना|पटियाला

शहर से 18 किमी. दूर स्थित 2 हजार की अाबादी वाले गांव बठोई खुर्द के सरपंच रणधीर सिंह ने लकड़ी अौर पर्यावरण बचाने के लिए सकारात्मक पहल की है। उन्होंने सांसद डॉ. धर्मवीर गांधी की मदद से गांव के श्मशानघाट में सिलेंडर से चलने वाली क्रीमेशन मशीन लगवाई। जो 1 जून से काम शुरू कर देगी। अब वह गांव के लोगों को अवेयर कर रहे हैं कि वो अगर घर में किसी की मौत होने पर मशीन से संस्कार कराएं। उनके मुताबिक अगर ऐसा होता है तो 7 क्विंटल लकड़ी बचेगी। 100 फुट ऊंची चिमनी लगाई गई है जिससे धुआं का असर भी खत्म हो सकेगा।

पंचायत की परंपरागत तरीकों की जगह पर्यावरण बचाने की पहल जरूरतमंद को खुद सिलेंडर देने का फैसला

आइडिया | अमेरिका में रहने वाले दोस्त से मिला

सरपंच रणधीर सिंह ने बताया कि उनका एक दोस्त परमजीत सिंह अमेरिका में है। कुछ महीने पहले जब उन्होंने इसे फोन किया तो उसने बताया कि वो अमेरिका में किसी भारतीय के संस्कार में है। 5 मिनट बाद जब उसकी बैककॉल अाई तो उन्होंने पूछा कि इतनी जल्दी संस्कार कैसे हो गया, तो पता चला कि विदेश में इलेक्ट्रिकल मशीन से संस्कार में 5 मिनट लगते हैं।

चैलेंज| अब लोगों को तैयार करना

जब गांव के लोगों से बात की तो वह परंपरागत तरीके से संस्कार करने पर अड़े रहे। उनका मानना है कि मशीन से संस्कार पर गति (मुक्ति) नहीं मिलेगी। सरपंच रणधीर ने बताया कि उन्होंने सांसद अौर डीसी से बात की है। प्रशासन गांव में अवेयरनेस कैंप लगाएगा। संत-महात्माअों से मदद लेने पर विचार चल रहा है। सरपंच ने खुद अपने परिवार के फॉर्म भरवा दिए हैं ताकि लकड़ी को बचाया जा सके।

मिसाल | गांव में 3 श्मशान घाट को किया एक

गांव में जाति अाधारित पहले 3 श्मशान घाट थे। लोग सांसद डॉ. धर्मवीर गांधी से मिले, तो उन्होंने एक श्मशान घाट बनाने का प्रस्ताव पास किया। मशीन खरीदने के लिए 2 लाख रु फंड दिया। फंड से मशीन खरीदी अौर पंचायती फंड से कमरा बनवाया। अगर कोई गरीब है तो पंचायत उसके संस्कार में इस्तेमाल होने वाले दो सिलेंडरों का खर्च खुद करेगी। एजेंसी ने पंचायत के नाम कनेक्शन दिया।

हाल | शाही शहर का

बीर जी श्मशानघाट में सरबत दा भला चैरिटेबल ट्रस्ट ने दिसंबर 2016 में 62 लाख रु खर्च कर एलपीजी क्रिमेशन मशीन लगाई थी। जागरुकता न होने के चलते डेढ़ साल में सिर्फ 95 संस्कार हुए। जबकि महीने में औसतन 180 तक संस्कार होते हैं। आंकड़ों के मुताबिक डेढ़ साल के हिसाब से यहां 5 से 6 दिन में एक संस्कार मशीन से किया गया।

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