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बिहार में समाज की सोच का झुकाव छोटे परिवार की इच्छा की ओर नहीं

3 वर्ष पहले
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आद्री स्थित सेंटर फॉर हेल्थ पॉलिसी (सीएचपी) की ओर से बिहार में अवरुद्ध जनसांख्यिक परिवर्तन विषय पर व्याख्यान आयोजित हुआ। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर पीएम कुलकर्णी मुख्य वक्ता थे। अपने व्याख्यान में प्रो. कुलकर्णी ने कहा कि भारत कुछ समय से जनसांख्यिक परिवर्तन से गुजर रहा है। अनेक राज्यों में प्रजनन दर प्रतिस्थापन स्तर के भी नीचे पहुंच चुकी है, लेकिन बिहार इस प्रक्रिया में पिछड़ रहा है।

हालांकि मृत्यु दर में गिरावट की दर, राष्ट्रीय औसत के समकक्ष चल रही है। लेकिन प्रजनन दर के मामले में थोड़ी ही कमी आई है। प्रो. कुलकर्णी ने कहा कि बिहार में प्रजनन दर को राष्ट्रीय औसत से ऊपर रखने में मुख्यतः दो कारक नजर आते हैं। पहला, प्रजनन दर में गिरावट को अवरुद्ध रखने में सामाजिक-आर्थिक विकास की समस्या तथा दूसरा परिवार कल्याण सेवाओं की जरूरतें पर्याप्त रूप से पूरा नहीं किया जाना। साथ ही, बिहार में छोटे परिवार की संकल्पना को शहरी, शिक्षित और संपन्न दंपतियों के बीच राष्ट्रीय औसत की तुलना में कम स्वीकृति मिली है। यानी पूरे समाज की सोच का झुकाव छोटे परिवार की इच्छा की ओर नहीं है, जैसा कि अन्य राज्यों में दिखता है। इससे पहले आद्री के निदेशक प्रोफेसर प्रभात पी. घोष ने विगत वर्षों के दौरान भारत में हुए जनसांख्यिकी परिवर्तनों की जानकारी दी। पटना विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. रासबिहारी प्रसाद सिंह ने जोर दिया कि बिहार की अपनी सख्त जनसंख्या नीति होनी चाहिए, जिससे कि जनसांख्यिक लाभांश का चरम उपयोग किया जा सके। इस चर्चा में शिक्षाविद, विकास सहभागियों और रिसर्च स्कॉलर व अन्य लोगों ने हिस्सा लिया। सेंटर फॉर हेल्थ पॉलिसी के डॉ. शाश्वत घोष ने धन्यवाद ज्ञापन किया।

आद्री की ओर से आयोजित व्याख्यान में बोलते प्रो. पीएम कुलकर्णी।

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