रमजान मुबारक माह के पहले जुमा को मस्जिदों में इबादत के लिए रोजेदारों की खासी भीड़ रही। मस्जिदों में हजारों लोगों ने दुआएं खैर के लिए हाथ उठाए। इस बीच छोटे-छोटे बच्चे भी दुआएं करने पहुंचे।
पहले रोजे पर ततारपुर मदरसा के कारी मोहम्मद अशफाक साहब ने कहा कि मंजिल तक पहुंचना तब आसान हो जाता है जब राह सीधी हो। मजहब इस्लाम में रोज़ा रहमत और राहत का रहबर है। रहमत से मुराद अल्लाह की मेहरबानी से है और राहत का मतलब दिल के सुकून से है।
अल्लाह की रहमत होती है तभी दिल को सुकून मिलता है। दिल के सुकून का मतलब नेकी और नेक अमल सतकर्म से है। इसलिए जरूरी है कि आदमी नेकी के रास्ते पर चले। रोज़ा बुराइयों पर लगाम लगाता है और सीधी राह चलता है। अल्लाह जिसे चाह सीधी राह दिखाए। मगफिरत व मोझ की मंजिल पर पहुचने के लिए सीधी राह हे रोज़ा। रोजा रखकर जब कोई शख्स अपने गुस्से, लालच, जुबान, जेहन, नफ़्स, इन्द्रियों पर काबू रखता है तो बह सीधी राह पर ही चलता है। रोज़ा भूख, प्यास पर तो नियंत्रण रखता है। घमंड, फरेब, छल-कपट, फसाद, झगड़ा, बेईमानी, बदगुमानी, बदतमीजी पर भी नियंत्रण है।