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भूखे को सहारा देने का अहसास दिलाता है रोजा

3 वर्ष पहले
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राेजा रमजान जहां हमारे धर्म का पालन है वहीं गरीबों के साथ हमदर्दी भी है। रोजा भूखे प्यासे सहारा देने का अहसास दिलाता है। रोजा जहां एक आदेश का पालन है वहीं इससे हमारे देश की तरक्की और उन्नति भी होती है। यह बात ततारपुर मदरसा के कारी अशफाश उल्ला ने विशेष नमाज अदा कराने के बाद अपनी तहरीर में कही।

उन्होंने बताया कि पूरे देश के मुस्लिम एक माह तक दो समय का खाना छोड़ देते हैं और गरीब और जरूरत मंदों की मदद करते हैं। इस पवित्र माह में गरीबों मोहताजों को दान, जकात और फितरा देने का हुक्म अल्लाह का है। रमजान माह में 10-10 दिन के तीन असरे होते हैं। पहला असरा एक से दस रोजे तक जो रहमत का होता है। दूसरा असरा 10 से 20 रोजा का जो मगफिरत का और तीसरा असरा 20 से 30 रोजे तक का आखरी जहन्नुम की आग से बचाव का होता है।

शाम होते ही सामूहिक रूप से करते है रोजा इफ्तार : सभी रोजेदार शाम होते ही मस्जिद में एकत्रित होकर सामूहिक रूप से रोजा इफ्तार करते हैं। रोजेदारों का सामूहिक तौर पर रोजा खुलवाने इफ्तार कार्यक्रम शुरू हो गए हैं। इस दौरान लोग मजहबी भाईचारे का सबूत देते हुए इन कार्यक्रमों में शामिल हो रहे हैं। लोग अपने-अपने घरों से तरह-तरह के मिष्ठान एवं इफ्तारी लेकर मस्जिदों में सबसे साथ रोजा खोलते हैं।

मस्जिदों में पढ़ी जा रही विशेष नमाज : रोजा इफ्तार के बाद इंशा की नमाज के बाद विशेष नमाज तराबी पढ़ी जा रही है। इसमें हाफिज द्वारा मौखिक कुरान पढ़ा जाता है। इस दौरान लोग ध्यान से कुरान को सुनते हैं।

रमजान के पवित्र माह के दौरान मस्जिद में विशेष नमाज अदा करते समाज के लोग।

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