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बच्चों को शिक्षा दिलाएं, शिक्षा के बिना कोई समाज तरक्की नहीं कर सकता

3 वर्ष पहले
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रमजान का पवित्र माह शुरू होते ही मस्जिदों में विशेष नमाज अदा की गई। बुधवार शाम को चांद दिखने के साथ ही मस्जिदों में विशेष नमाज तरावीह शुरू हो गई। गुरुवार से रमजान का पहला रोजा रखा गया।

मस्जिदों में नमाजियों की संख्या में भी इजाफा होने लगा है। लोग अल्लाह की इबादत में लग गए हैं। गुरुवार को रोजा इफ्तार से पहले जामा मस्जिद के मुफ्ती चौधरी आमिर ने लोगों से कहा कि रोजा पाबंदी से रखें। उन्होंने पूरे रमजान माह की इज्जत व एहतराम करने की ताकीद दी। उन्होंने मुस्लिमों से कहा कि अपने बच्चों को शिक्षा अवश्य दें। शिक्षा के बिना कोई समाज तरक्की नहीं कर सकता। इस्लाम कहता है कि सीखना हर मुसलमान का फर्ज है। उन्होंने कहा कि रमजान में हमें अपने देश के अमन चैन की दुआ करना चाहिए। दूसरे रोजे का महत्व ख्याल और अमल की पाकीजगी का पैगाम है। रोजा ख्याल का मतलब है विचार। अमल के मायने हैं कार्य। भाव यह है कि विचार और कार्य की पवित्रता का संदेश है रोजा। जो शख्स रोजा यानि उपवास रखता है उसके जिस्म दिल, दिमाग, बातचीत और अमल में पाकीजगी होनी चाहिए। अगर नीयत में खोट रखता है, वादा करके मुकरता हे, मां बाप और बुजुर्गों की बेअदबी करता हे, महिलाओं को बुरी नज से देखता है, बच्चों से बदसलूकी करता है, परिंदों और बेजुबानों को सताता है,अमानत में खयानत करता है, हरियाली को तबाह करता है, पानी की फिजूलखर्ची करता है, अहसान करके ढिंढोरा पीटता, आश्रितों पर छींटाकशी करता है यह नापाक कार्य हैं। जबकि रोजेदार के लिए पाकीजगी शर्त है। हजरत मोहम्मद सल्लल्लाहो अलैहि व सल्लम का इरशाद है कि जो शख्स रोज़ा रखकर भी अपने जाहिर और बातिन को रोजेदार न बनाए तो अल्लाह को उसकी परवाह नहीं ।

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