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ओबीसी आरक्षण 21 से 26% करने पर कोर्ट ने जवाब मांगा

3 वर्ष पहले
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लीगल रिपोर्टर.जयपुर | हाईकोर्ट ने ओबीसी सूची का परीक्षण किए बिना भरतपुर व धौलपुर के जाटों को आरक्षण देने और ओबीसी आरक्षण 21 से बढ़ाकर 26 प्रतिशत करने करने के मामले में सरकार से सवाल किया है कि वे इस मामले में 10 अगस्त 2015 को दिए आदेशों की पालना कैसे करेंगे। मूलसिंह की अवमानना याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायाधीश केएस झवेरी व वीके व्यास की खंडपीठ ने यह अंतरिम निर्देश दिए। सुनवाई के दौरान केन्द्र सरकार ने कहा कि राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को भंग कर उसे संवैधानिक दर्जा देने के लिए प्रयास किया जा रहा है। इस बारे में एक बिल भी लोकसभा में पेश कर दिया है। ऐसे में अदालती आदेश का पालन करने में समय लगेगा। वहीं राज्य सरकार ने कहा कि इस संबंध में राजस्थान राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग एक्ट 2017 पारित कर दिया है। लेकिन राज्य सरकार पर यह पाबंदी नहीं है कि वह हर दस साल में ओबीसी सूची का परीक्षण करे। यह उसके विवेक पर निर्भर करता है और राज्य सरकार को इसकी आवश्यकता नहीं लगी। ऐसा करने पर सौ करोड़़ रुपए का भार पड़ेगा। जिस पर प्रार्थी ने कहा कि अदालत ने मामले में केन्द्र व राज्य सरकार को स्पष्ट निर्देश दिया था। लेकिन वह आदेश का पालन नहीं कर रही, लिहाजा पालना करवाया जाए। गौरतलब है कि अवमानना याचिका में हाईकोर्ट के 10 अगस्त 2015 के फैसले का पालन नहीं होने को चुनौती देते हुए कहा कि अदालत ने जाट आरक्षण केस में केन्द्र व राज्य सरकार को ओबीसी सूची का पुन: परीक्षण करने, आंकड़े इकट्ठे करने और इनका अध्ययन करने का निर्देश दिया था। साथ ही कहा था कि वे इस बात से प्रभावित नहीं हो कि किसी जाति को ओबीसी वर्ग में अंदर या बाहर करने से संबंधित कोई प्रतिवेदन लंबित है या नहीं। लेकिन इस आदेश का पालन नहीं हुआ।

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