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देखरेख नहीं इसलिए बेकार हो रही धरोहर

3 वर्ष पहले
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जिले के पुरातात्विक धरोहर धीरे-धीरे खत्म होते जा रहे हैं। शासन की लगातार अनदेखी के कारण शैलचित्र, शैलाश्रय धीरे-धीरे समाप्त हो रहे हैं। इसे सहजने के लिए जिले में पुरातत्व संघ भी हैं, लेकिन वह अपनी जिम्मेदारियों से बच रही है। जिले में ऐसी प्राकृतिक धरोहर हैं जिनकी तुलना विश्व के कुछ सबसे पुराने धरोहरों से की जाती है। इनके बावजूद संरक्षण को लेकर संघ या शासन कोई प्रयास नहीं कर रहा है। इन स्थानों के बारे में कई पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं और फिल्म भी बन चुकी है। कलेक्टर पुरातत्व संघ का पदेन अध्यक्ष होता है | शेष पज 16





इसके बावजूद पुरातात्विक धरोहरों का बुरा हाल है। इसी कारण इन सभी प्राकृतिक धरोहरों के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है। जिले में गुफाएं, प्राचीन मंदिर, शैलाश्रय और पुरावशेष के लगभग 33 स्थान है। लगातार जर्जर स्थिति में होने के कारण अब इन स्थानों पर पर्यटक नहीं के बराबर हैं।





ये है प्राकृतिक धरोहर जिन्हें सहेजने की जरूरत

सिंघनपुर गुफा-

रायगढ़ से बीस किलोमीटर दूरी पर सिंघनपुर गावं के पास खाड़ाघर पर्वत श्रेणी में शैलाश्रय है जो कि आदि मानव के निवास के प्रमाण है। यहां पर हिरण, सुअर, गोह, पंख वाला घोड़ा, रेखा गणितीय की आकृतियां है। इस शैलाश्रय की गिनती दुनिया के सबसे प्राचीन शैलाश्रयों में होती है। यहां बने सीढ़ीनुमा पुरुष की तुलना ऑस्ट्रेलिया की गुफा में मिले सीढ़ीनुमा पुरुष से की जाती है। इसे मध्यप्रदेश के समय से राज्य शासन के द्वारा राज्य संरक्षित स्मारकों में शामिल किया गया है, लेकिन संरक्षण के नाम पर कभी कुछ भी नहीं हो पाया है।

कबरा पहाड़-

रायगढ़ से पूर्व की ओर लगभग 12 किलोमीटर की दूरी पर गजमार (कबरा) पहाड़ है। यहां शैलाश्रय के साथ। भित्तिचित्र में छिपकली, घड़ियाल, साम्हर, तथा अन्य पशुओं के चित्र और गोल चक्र पहिए का प्रारंभिक रुप चित्रों को दर्शाया गया है।

करमागढ़ पहाड़

रायगढ़ से तीस किलोमीटर दूर उत्तर पूर्व करमा गढ़ पहाड़ पर भी शैलचित्रों का भंडार है। जिले के अन्य स्थानों में से पाए गए शैलचित्रों से यहां के शैल चित्र काफी भिन्न है। यहां मेढक, कछुआ, और सांप के बड़े-बड़े चित्र लाल तथा पीले रंग में है। यहां के चित्र ओडिशा में मिली चित्रों से मेल खाती है।

पुजारीपाली, पंचधार-

सारंगढ़ तहसील में सरिया के जमींदार प्राचीन काल सभ्यता के अवशेष सबसे पहले यहां मिले है। पुजारीपाली व पंचधार के मध्य विशाल शिव मंदिर उसमें स्थित शिवलिंग व सामने स्थित कुआं भी कलचुरी वैभव को दर्शाता है।

जशपुर, सारंगढ़

सारंगढ़ के जशपुर गांव में महानदी के दक्षिण तट पर स्थित ग्राम जशपुर में मंदिरों के अवशेष, जिनमें गुंबद, चक्र, कंगूरे, स्तंभ व शिवलिंग विष्णु की खंडित प्रतिमाएं मिली थी। ये सभी कलचुरी वंश के समय की है। यहां मिले कुछ मूर्तियों को संग्रहालय में रखा गया है।

विश्व धरोहर दिवस

कभी जिले की पहचान बनी धरोहर अब खो रही अपनी पहचान

प्रशासन ने ध्यान नहीं दिया तो किताबों में ही बचेगा अस्तित्व

संग्रहालय में रखी गई मूर्तियां और दूसरे अवशेष दिखाता विभाग का कर्मचारी।

पुरातत्व संग्रहालय भी जर्जर. पुरातात्विक धरोहरों को सहेजने के लिए वर्ष 2014 में नटवर स्कूल मैदान के पास से संग्रहालय की शुरुआत की गई थी। संग्रहालय में प्राचीन मंदिरों से लाए गई खंडित मूर्तियां, कलचुरी वंश की मूर्तियां, मिट्टी के बर्तन, झारा शिल्पियों द्वारा बनाई गई कलाकृति, ताम्रपत्र और पुरातत्व के अवशेष कुछ जिले से अनूठे कला के नमूने मौजूद है। 2014 के बाद से मेंटनेंस नहीं किया गया है।

पुरातात्विक समिति की बैठक नहीं

जिले में धरोहरों को सहेजने और उनकी जानकारी जुटाने जिला पुरातत्व समिति गठित है, मगर इसकी नियमित बैठक भी नहीं होती। जिसके चलते हमारे धरोहरों की उपेक्षा हो रही है। लंबे समय से इस समिति की बैठक नहीं होती। समिति के कई सदस्य इस जिले में नहीं रहते ऐसे में इसके पुनर्गठन की आवश्यकता है।

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