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अफसरों ने ध्यान नहीं दिया इसलिए सालों से अधूरे हैं काम, प्लान से 500 करोड़ तक बढ़ गई लागत

3 वर्ष पहले
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जिले में बड़ी योजनाएं बनीं, करोड़ों रुपए का बजट भी आया। योजनाओं से लोगों को फायदा मिलना तो दूर काम पूरा नहीं हो सका जिससे लागत भी दो गुना तक बढ़ गई। डेढ़ लाख से ज्यादा शहरवासियों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने के लिए 12 साल पहले शुरू की गई जल आवर्धन, 177 गांवों के करीब 23 हजार हेक्टेयर खेतों पर सिंचाई के लिए केलो परियोजना, मेडिकल कालेज, शहर में 25 सड़कों का निर्माण, ऑडिटोरियम समेत कई ऐसे प्रमुख काम हैं जो सालों बाद भी पूरे नहीं हो सके हैं। जिले भर में अधूरे पड़े कामों की लागत 500 करोड़ रुपए से ज्यादा बढ़ चुकी है।

केलो सिंचाई परियोजना की शुरुआत में लागत 598 करोड़ रुपए थी, अब बढ़कर 920.47 करोड़ रुपए हो गई है। 2015 में पूरे होने वाले इस काम की नई डेडलाइन अब 2019 है। इसमें नहरें पूरी नहीं हो पाई हैं, जो पहले बनी थीं वहां रिटेनिंग वाल खराब हो गई है, झाड़ उग गए हैं | शेष पज 16





39 करोड़ की जल आवर्धन योजना की लागत 12 साल में बढ़कर 39 करोड़ हो गई। अब तक शहरवासियों को इसका लाभ नहीं मिला है। पीएचई और नगर निगम के बीच समन्वय नहीं होने का खामियाजा शहरवासियों को भुगतना पड़ रहा है। वहीं लागत बढ़ने से पैसे का दुरुपयोग भी हुआ है। इसके अलावा शहर के 25 सड़कों की लागत 76 करोड़ से 82 करोड़, निगम के ऑडिटोरियम के साढ़े 3 से 10 करोड़, अमृत मिशन 124 से 162 करोड़ रुपए होने सहित कई ऐसी योजनाएं हैं।

कामों के अधूरा रहने की वजह विभाग के अफसरों की ढिलाई है, कहीं गलत काम कराया तो कहीं पैसे ज्यादा खर्च किए

केलो सिंचाई परियोजना - शुरू में इस काम के लिए 598 रुपए दिए गए थे, अब लागत 920 करोड़ पहुंच गई। रायगढ़ एवं जांजगीर चांपा जिले के करीब 175 गांवों में खेतों तक सिंचाई का पानी पहुंचाने इस योजना की शुरुआत जनवरी 2008 में की गई थी। इतनी राशि में भी पूरा होने के आसार नहीं है। केलो सिंचाई परियोजना के ईई पीके शुक्ला के मुताबिक जमीन अधिग्रहण सहित अन्य कार्यों की वजह से इस परियोजना को पूरा करने में विलंब हुआ। वहीं भू अर्जन की लागत पहले की तुलना में अब बढ़ गई है।

25 सड़कों का निर्माण. काम पूरा नहीं हुआ है और 6 करोड़ का अतिरिक्त भुगतान भी हो गया है। शहर की 25 सड़कों के लिए 69 करोड़ रुपए का बजट 2011 में रखा गया था। सड़क अब तक पूरी नहीं बन पाई है और इसमें 6 करोड़ रुपए अतिरिक्त ठेकेदारों को भुगतान हो चुका है। शेष सड़कों को पूरा करने के लिए निगम को पैसों की जरूरत है। निगम कमिश्नर विनोद पांडेय इसे पुराना मामला बता रहे हैं। रायपुर के ठेकेदार राधेश्याम मेसर्स पर द्वारा काम शुरू करने से पहले जमा 10 प्रतिशत टी डीआर की राशि भी लौटा दी गई।

अमृत मिशन - 124 से 162 करोड़ रुपए शहर में अगले 20 सालों के लिए जल आपूर्ति के लिए अमृत मिशन योजना तीन साल पहले शुरू की गई थी। इस योजना में अब तक 50 फीसदी भी काम पूरा नहीं हुआ है। योजना की शुरुआत में लागत 124 करोड़ की थी, लेकिन अब 162 करोड़ रुपए हो चुकी है। इसमें शहर में पांच जगहों पर पानी टंकी का निर्माण, 368 पाइप लाइन बिछाया जाना है। अमृत मिशन के नोडल अधिकारी व ईई आरके भोजसिया ने बताया कि दर पर सहमति नहीं बनने की से 3 बार निविदा निरस्त हुई।

नगर निगम ऑडिटोरियम. 2011 में ऑडिटोरियम की घोषणा की थी। निगम के अधिकारियों ने इसके लिए इस्टीमेट बनाकर शासन को प्रस्ताव भेजा जिस पर 10 अप्रैल 2012 को शासन से 3 करोड़ 9 लाख 72 हजार रुपए निगम को मिले। अब इसकी लागत 10 करोड़ रुपए पहुंच चुकी है। निगम को शासन से पैसे नहीं मिलने की वजह से कलेक्टर द्वारा सीएसआर मद से इस योजना को पूरा कराया जा रहा है। मनमाने खर्च के कारण लागत बढ़ गई। शासन से मिले पैसे से निर्माण पूरा नहीं हो पाया।

मेडिकल कॉलेज- शहर में मेडिकल कालेज का निर्माण मार्च 2010 में शुरू हुआ था।इसकी लागत शुरुआत में 106 करोड़ 35 लाख रुपए थी, 8 सालों में दोगुनी हो गई। 200 करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च हो चुके हैं लेकिन काम पूरा नहीं हुआ है। बार बार डिजाइन बदलने और पीडब्ल्यूडी और अन्य निर्माण एजेंसियों द्वारा गलत निर्माण कराने और ढिलाई बरतने के कारण देर हुई। पीडब्ल्यूडी के अफसर बड़े प्रोजेक्ट में समय लगने और समय के साथ मटेरियल की कीमत बढ़ने को लागत बढ़ने और देर होने की वजह बता रहे हैं।

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