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स्वच्छता के नाम पर 5 करोड़ से ज्यादा खर्च, फिर भी नहीं सुधरी सफाई व्यवस्था

3 वर्ष पहले
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केंद्रीय शहरी विकास मंत्रालय ने बुधवार को स्वच्छ शहरों की सूची जारी की। केंद्र ने 52 अलग-अलग कैटेगरी में नंबर-1 बनने वाले शहरों को इसमें शामिल किया। केंद्र ने जो सूची जारी की, उसमें रायगढ़ निगम का नाम शामिल नहीं है। निगम के अफसर भी मान रहे हैं कि पिछले तीन सालों की तरह इस बार भी हम पिछड़ चुके हैं। निगम के अफसरों का दावा है कि स्वच्छता रैंकिंग में बेहतर करने के लिए इस साल निगम प्रशासन ने सफाई के लिए पूरी ताकत झोंक दी थी। मगर इससे रैंकिंग नहीं सुधर पाई।

रैंकिंग में लगातार पिछडऩे के कारणों की भास्कर ने पड़ताल की तो कुछ कमियां मिली। निगम ने जो भी प्रयास किए पर वह उसे अंजाम तक नहीं पहुंचा पाई। पिछले साल के प्रयासों में ही कुछ इंप्रवूमेंट लाते तो आज किसी न किसी कैटेगरी में रायगढ़ का नाम भी होता। इस साल सफाई, डोर टू डोर कचरा कलेक्शन, डस्ट बीन खरीदी, एसएलआरएम सेंटर, सार्वजनिक टायलेट सहित अन्य सर्वेक्षण के लिए निगम ने पांच करोड़ रुपए से भी अधिक खर्च किए हैं पर काम की सही मानिटरिंग नहीं होने से हम अन्य जिलों से पिछड़ गए।

रैंकिंग जो जारी हुई है उसमें रायगढ़ निगम का नाम शामिल नहीं है। सूची जारी करने के बाद ही स्थिति का पता चलेगा। बेहतर करने के लिए हमारी तरफ से पूरी कोशिश की गई है। मोतीचंद जैन, प्रभारी स्वास्थ्य अधिकारी।

सफाई खर्च व उपलब्ध संसाधन

48 वार्डों की सफाई का जिम्मा

48 वार्डों में डोर टू डोर कचरा कलेक्शन

05 एसएल आरएम सेंटर का निर्माण पूरा

60 लाख रुपए प्रति माह खर्च

320 सफाई प्लेसमेंट कर्मचारी

92 नियमित सफाई कर्मचारी

300 सफाई के लिए वाहन

05 एसएल आरएम सेंटर का काम अधूरा

104 पिछले साल देश में रैंक पर

92 महिला स्व सहायता समूह

इन कमियों से हम पिछड़ें

1. डोर टू डोर कचरा कलेक्शन के बावजूद 25 से 30 फीसदी ऐसे भी जो कचरा सड़कों पर फेंक रहे हैं।

2. नगर निगम द्वारा सड़कों पर आ रहे कचरों को रोकने के लिए जुर्माने का प्रावधान है।

3. पहली बार पकड़े जाने पर 200 रुपए, उसके बाद 5 सौ रुपए जुर्माना लगाने का प्रावधान रखा, लेकिन जुर्माना नहीं लगाया जा रहा है। लोगों में भय नहीं।

4. शहर में बने शौचालयों का मेंटेनेंस बड़ा विषय था। निगम ने सिर्फ रंग-रोगन का काम किया। कई शौचालय में पानी तक नहीं है।

5 साढ़े 7 हजार टायलेट निर्माण में करोड़ों की गड़बड़ी होने से निगम की छवि हुई धूमिल।

6. सर्वेक्षण के समय 10 में 3 का ही निर्माण पूरा हो पाय । अब तक 5 का निर्माण पूरा हो पाया है।

ये परिवर्तन कर लें तो पोजिशन सुधर जाएगी

कचरा प्रबंधन बहुत देरी से: फरवरी में जब सर्वे के लिए दिल्ली की टीम का यहां दौरा हुआ था, तब शहर में सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट का काम अधूरा था। डोर टू डोर कचरा प्रबंधन भी प्रारंभिक तौर पर 48 की जगह 15 वार्डों में ही। कूड़ा प्रबंधन के लिए बनाए गए सिटी वेस्ट मैनेजमेंट सेंटर में भी काम अच्छा नहीं चल रहा है। शहर में अब भी खुले में ही कचरा डंप हो रहा है। स्वच्छ सर्वेक्षण में यह महत्वपूर्ण बिंदु है। माना जा रहा है कि कचरा प्रबंधन में नाकामी बड़ी वजह हो सकती है।

सफाई नहीं होने से मालधक्का के पास कचरे का अंबार लग गया है।

पूरी तरह डस्टबिन नहीं बंटी: घरों से सूखा और गीला कचरा अलग-अलग जमा करने के लिए 48 वार्डों में डस्टबिन बांटी जानी थी। लेकिन जिस वक्त सर्वे किया गया, पता चला कि डस्टबिन शहर में सिर्फ 60 फीसदी घरों तक ही पहुंच पाई है।

मोबाइल एप में भी पिछड़े: दिल्ली की टीम ने यहां जिन बिंदुओं पर सर्वे किया था, उनमें सफाई के लिए मोबाइल एप का इस्तेमाल शामिल है। सफाई की शिकायतों के निराकरण के लिए स्वच्छता एप लोगों के मोबाइल पर डाउनलोड कराया, लेकिन अभियान चलाने के बावजूद केवल 4 हजार लोगों ने यूज किया। एप में जैसे ही शिकायत अपलोड की जाए, तुरंत निराकरण होना चाहिए। लेकिन निराकरण में ही एक से दो दिन तक लग रहे हैं।

नियमित सफाई नहीं: शहर की नियमित सफाई नहीं होती। स्वच्छता सर्वेक्षण के लिए जब दिल्ली की टीम आने वाली थी। तभी निगम ने सक्रियता दिखाई। रेगुलर सफाई नहीं होने के कारण जगह जगह कूड़ा कचरा डंप पड़ा रहता है।

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