मृत्यु भोज की प्रथा खत्म, 25 साल बाद मिली सफलता
शहर से करीब 12 किमी दूर स्थित गांव लिंजिर। यहां के श्रीपति प्रधान 80 साल पिछले 25 सालों से अकेले मृत्यु भोज के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे थे। कोलता समाज से इस प्रथा को खत्म करने के लिए उन्हें काफी परेशानी झेलनी पड़ी लेकिन मरने की बाद उन्हें सफलता मिली। बुधवार को श्रीपति गुप्ता की मौत हो गई। इसके बाद कोलता समाज ने भी मान लिया कि मौत के बाद मृत्यु भोज खिलाना एक गलत परम्परा है। अब परिवार के लोगों ने न सिर्फ वृद्ध की मौत के बाद मृत्युभोज देने से इनकार कर दिया है।
कोलता समाज के संभागीय कार्यकारी अध्यक्ष त्रिनाथ गुप्ता ने बताया कि लाखों रुपए खर्च करने के बाद जब किसी की मौत होती है तो परिवार में दुख की स्थिति होती है। ऐसे में मृत्युभोज कराने के लिए लोग कर्ज लेने के लिए भी मजबूर होते हैं। यह गलत प्रथा है। समाज में अब यह कोशिश होगी कि मृत्यु भोज नहीं दिया जाए। इसके लिए लोगों को जागरूक किया जाएगा।
हिंदुओं में किसी की मौत के बाद उसके दशकर्म के बाद मृत्युभोज दिए जाने की परम्परा पिछले कई दशकों से चली आ रही है। कहा जाता है कि मृत्यु भोज के बिना मृतक को मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती है। इसलिए हिंदू समाज में यह परम्परा कई दशकों से चल रहा है। हालांकि इस परम्परा को हिंदू धर्म के कई समाज ने खत्म करने की शुरुआत भी कर दी है।
इसमें अब कोलता समाज भी जुड़ गया है।
मिसाल
80 साल के श्रीपति ने मेडिकल कॉलेज अस्पताल को किया देह और नेत्र दान
समाज के लोग आपस में चर्चा करते।
ऐसे शुरू की थी प्रथा खत्म करने की पहल
जनसंघ आंदोलन में सक्रिय रहे श्रीपति प्रधान पिता चमरा प्रधान 80 साल ने करीब 25 साल पहले अपने नजदीकी रिश्तेदार की इलाज में हजारों रुपए खर्च करने के बाद मौत होने और बाद में उसकी कर्ज लेकर मृत्युभोज देते हुए देखा था। इसको देख श्रीपति बहुत आहत हुए। इसके बाद उन्होंने मृत्युभोज का बहिष्कार करना शुरू कर दिया।