22 एकड़ पर बना बाघ तालाब अब सूख चुका है, मालिकाना हक को लेकर विवाद भी
रायगढ़ | आजादी के बाद तक रायगढ़ राजघराने के हक़ वाला बाघ तालाब, जिले का संभवत: सबसे बड़ा तालाब है। अब यहां पानी नहीं है। चारों ओर अतिक्रमण हो चुका है। लगभग दो एकड़ का हिस्सा बचा है, जहां बच्चे क्रिकेट खेलते हैं। मालिकाना हक़ के दावे, खरीद-बिक्री के चक्कर में सालों से कोर्ट-कचहरी में रखी फाइलों में बंद बाघ तालाब का न तो सौंदर्यीकरण हो रहा है और न ही यह उपयोगी है। सबसे पहले आजादी के कुछ सालों बाद राजपरिवार से पड़िगांव के संवरा आदिवासी व्यक्ति को बेचना दिखाया गया। अस्सी के दशक के आखिर में सरदार नारायण सिंह ने इसे खरीद लिया। मछली पालन के नाम पर खरीदे गए बाघ तालाब में वोटिंग शुरू कराई गई। 22 एकड़ का तालाब सूखने के बाद यह जमीन हो गया। लगभग 5 साल पहले नारायण सिंह द्वारा दान में दिया बताकर अमित रतेरिया ने इस दावा ठोका। 18 साल पुरानी लिखा-पढ़ी दिखाई गई। समाजसेवियों के विरोध के बाद बाघ तालाब फिर सुर्खियों में आया। चार साल पहले नजूल अधिकारी ने अमित के पक्ष में नामांतरण कर दिया। तत्कालीन कलेक्टर मुकेश बंसल को इसका पता चला तो उन्होंने नामांतरण निरस्त कर दिया। इसके बाद से कलेक्टर कोर्ट में मामला लंबित है।
राजमहल के नजदीक शहर का प्राचीन बाघ तालाब, अब यहां पानी नहीं है, बच्चे क्रिकेट खेलते हैं।